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जब इंसान पेण्डुलम बन जाता है India Uttar Pradesh 

जब इंसान पेण्डुलम बन जाता है

कृपया बतायें यहाँ मेरा निर्णय क्या होना चाहिए था?
Alok maharajganjप्रकृति द्वारा प्रदत्त सुख या दुःख व्यक्ति के जीवन का अभिन्न अंग है जिसके आनंद और ताप को नियंत्रित करने में इंसानी विवेक की भूमिका जीवन को सरल बना देती है! लेकिन कभी कभी वक्त इन दोनों से अलग मानवीय जीवन को असमन्जसता के एक ऐसे मुहाने पर खड़ा कर देता है जहाँ व्यक्ति का ज्ञान ही विवेक को शून्य कर देता है और इंसान पेण्डुलम बन जाता है!

मुझे याद है कि एक बार मै माँ के पास बैठे बैठे पिताजी से पूछा कि पिताजी दुनिया में सबसे बड़ा “पुण्य और सबसे बड़ा पाप” क्या है? पिताजी मेरे बालमन पर मुस्कुराते हुए बोले किसी की जिंदगी बचाना या जीवनदान देना सबसे बड़ा पुण्य और किसी का आहार छिनना पेट पर लात मारना सबसे बड़ा पाप है! मुड़कर माँ की आँखों में देखा तो उसकी भी सहमति ने इस सही जबाब को मेरे अन्तःकरण में और भी गहराई से स्थापित कर दिया! उसके बाद पाप और पुण्य के इस परिभाषा पर सदैव मेरा ध्यान आकर्षित होता रहा!

किन्तु आज की घटना ने मुझे ही नहीं हम सबको उस वक्त विवेकशून्य कर दिया जब मैं गांव के ही युवा पत्रकार प्रिय अनुराग पाण्डेय व समर्पित समाजसेवी अनुज आशीष जी के साथ अपने गांव के बाग़ में बैठे वर्षो से वेंटिलेटर पर साँस लेते क्षेत्र की बिजली व्यवस्था पर चर्चा कर रहे थे कि….
अचानक मेरी दृष्टि आशीष जी के रुमाल पर गयी जिसपर एक पीली हड्डी की सबसे पीछे वाली टांग एक लाल चींटा (बड़ा वाला जो अक्सर आम के पेड़ पर होते हैं) इस तरह पकड़ रखा था कि छह टांग और दो पंख वाली वह पीली हड्डी अपने सम्पूर्ण जीवन के संजोये हुए ताकत अनुभव व तरीके को युद्ध नीति के तहत बारी बारी से आजमाने के लगभग 20 मिनट बाद भी उसके पकड़ से अपने को आजाद न कर पा रही थी!और हम तीनो एक के मुंह में भोजन और दूसरे के प्राण के संकट का दृश्य किंकर्तव्यविमूढ़ होकर देख रहे थे!पिताजी द्वारा प्राप्त उस ज्ञान की वजह से मेरी स्थिति और भी दयनीय हो चुकी थी! उसके बाद क्या हुआ?….बाद में!

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Navin Kr Roy: श्रीमान आलोक जी वास्तव में यह ऐसा प्रश्न और परिस्थिति है जिसमे मनुष्य किकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है।पर मेरे विचार से इंसान होने के नाते उस परिस्थिति में हड्डी को बचाना सर्वथा उचित कदम माना जाना चाइये।क्योंकि चींटे की औकात से ज्यादा भोजन सामग्री हड्डी के रूप में है,जिसके छीन जाने के उपरान्त भी चींटे द्वारा अपने भोजन का कोई दूसरा उपाय करना संभव है।या जीवन बचानेवाले द्वारा भी उस चींटे के भोजन की कोई अन्य व्यवस्था की जा सकती है।इस तरह एक भूखे को भोजन और दूसरे के जीवन की ऱक्षा भी हो जाती।
 
Poonam Pandit: आलोक भईया किसी असहाय जीव के प्राणों को बचाना भी पुण्य की श्रेणीं मे आता है। रही बात भोजन की तो नवीन भईया के कहे अनुसार दूसरी व्यवस्था की जा सकती है।
 
Alok Sharma: सादर आभार आदरणीया बहन पूनम जी!ऐसा ही मै किया यही उचित भी था!लेकिन बाद की घटना में हम तीनों बिना दोनों के अंगों को क्षति पंहुचाये हड्डी को आजाद कराने का यत्न ही कर रहे थे कि चींटे के पैर की पकड़ जैसे ही कमजोर हुयी हड्डी उसे लेकर आसमान में उड़ गयी!आगे पक्ष या विपक्ष दोनों में किसी एक का नुकसान निश्चित है!
 
Rekha Rai: है तो चींटी और हड्डी की बात। जो आपने यत्न किया वो ही उचित और जरूरी था।पर चींटे के पैर की पकड़ जैसे ही कमजोर हुई हड्डी उसे लेकर आसमान में उड़ गई।दोनों में एक का नुकसान निश्चित है।
भैया पढ़ने के बाद लगा कि ये स्थिति तो आज हम इंसानों में भी, आसपास घटित होती मालूम पड़ती है।
भैया कभी कोई न्याय सर्वमान्य नही होता ।जब ऐसा सवाल सामने हो की पहले भोजन कि पहले जीवन दान ।तो प्राथमिकता जीवन दान ही होता है आपने जो किया न्याय पुरा नही हुआ।थोड़ी असहजता जरूर हो गयी।
 
Pushp Kumar Maharaj ये न्याय प्रकृति प्रदत्त व ईश्वरीय व्यवस्था है….जिसे खाद्य श्रृखला कह सकते है..जैसे कीटों को मेढक खा जाता है मेढक को साँप व साँप को बाज….अपनी उर्जा के लिये…इस व्यवस्था में पाप पुन्य का निर्धारण नही किया जा सकता…….
हाँ आपके पिता जी वाली बात अक्षंरतः सही है……
जीवो जीवे अहारा.

Mahrajganj#Alok Mahraj#

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