जब इंसान पेण्डुलम बन जाता है
कृपया बतायें यहाँ मेरा निर्णय क्या होना चाहिए था?
प्रकृति द्वारा प्रदत्त सुख या दुःख व्यक्ति के जीवन का अभिन्न अंग है जिसके आनंद और ताप को नियंत्रित करने में इंसानी विवेक की भूमिका जीवन को सरल बना देती है! लेकिन कभी कभी वक्त इन दोनों से अलग मानवीय जीवन को असमन्जसता के एक ऐसे मुहाने पर खड़ा कर देता है जहाँ व्यक्ति का ज्ञान ही विवेक को शून्य कर देता है और इंसान पेण्डुलम बन जाता है!
मुझे याद है कि एक बार मै माँ के पास बैठे बैठे पिताजी से पूछा कि पिताजी दुनिया में सबसे बड़ा “पुण्य और सबसे बड़ा पाप” क्या है? पिताजी मेरे बालमन पर मुस्कुराते हुए बोले किसी की जिंदगी बचाना या जीवनदान देना सबसे बड़ा पुण्य और किसी का आहार छिनना पेट पर लात मारना सबसे बड़ा पाप है! मुड़कर माँ की आँखों में देखा तो उसकी भी सहमति ने इस सही जबाब को मेरे अन्तःकरण में और भी गहराई से स्थापित कर दिया! उसके बाद पाप और पुण्य के इस परिभाषा पर सदैव मेरा ध्यान आकर्षित होता रहा!
किन्तु आज की घटना ने मुझे ही नहीं हम सबको उस वक्त विवेकशून्य कर दिया जब मैं गांव के ही युवा पत्रकार प्रिय अनुराग पाण्डेय व समर्पित समाजसेवी अनुज आशीष जी के साथ अपने गांव के बाग़ में बैठे वर्षो से वेंटिलेटर पर साँस लेते क्षेत्र की बिजली व्यवस्था पर चर्चा कर रहे थे कि….
अचानक मेरी दृष्टि आशीष जी के रुमाल पर गयी जिसपर एक पीली हड्डी की सबसे पीछे वाली टांग एक लाल चींटा (बड़ा वाला जो अक्सर आम के पेड़ पर होते हैं) इस तरह पकड़ रखा था कि छह टांग और दो पंख वाली वह पीली हड्डी अपने सम्पूर्ण जीवन के संजोये हुए ताकत अनुभव व तरीके को युद्ध नीति के तहत बारी बारी से आजमाने के लगभग 20 मिनट बाद भी उसके पकड़ से अपने को आजाद न कर पा रही थी!और हम तीनो एक के मुंह में भोजन और दूसरे के प्राण के संकट का दृश्य किंकर्तव्यविमूढ़ होकर देख रहे थे!पिताजी द्वारा प्राप्त उस ज्ञान की वजह से मेरी स्थिति और भी दयनीय हो चुकी थी! उसके बाद क्या हुआ?….बाद में!
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