जब नालंदा में दुनिया का पहला विश्वविद्यालय देखा
प्राचीन नालन्दा विश्वविद्यालय की गौरवशाली भूमि पर कदम रखते ही अत्यंत आनंद की अनुभूति हुई। प्रवेश द्वार से ही पर्यावरण की हरियाली चारों ओर इस विश्वविद्यालय के भग्नावशेषों में भी जान डाल रही थी। अत्यंत सुनियोजित ढंग से और विस्तृत क्षेत्र में लाल ईंट पथरों से बना हुआ नालंदा विश्वविद्यालय प्राचीन दुनिया का संभवत: पहला विश्वविद्यालय था, जहां न सिर्फ देश के, बल्कि विदेशों से भी छात्र पढ़ने आते थे।
प्रियंका राय/पटना

प्रातः बेला में गर्मी से थोड़ी राहत थी।
हम सब अक्सर सड़क जाम में ना फंसने के डर से गया रूट से यातायात करना बेहतर समझते हैं। इसलिये, मन में महात्मा गौतम बुद्ध के दर्शन का विचार आया और मैंने अपने भैया को ‘बोध गया’ के भ्रमण की इक्छा जाहिर की। पर, बाईपास आते ही गया वाले मार्ग में पहले से ही लम्बा जाम देखकर हम सबने इरादा बदल दिया और फोर लेन से बख्तियारपुर की तरफ हमारी कार निकल पड़ी।
रास्ते में संगीत का आंनद लेते हुए हमारी यात्रा चल रही थी। कार में “जॉनी मेरा नाम” फ़िल्म का गीत बज रहा था, ‘वादा तो निभाया’…. जो देव आनंद साहब और हेमा मालिनी जी पर फिल्माया एक बहुचर्चित गीत है। और विदित हो की इस गाने की शूटिंग प्राचीन नालन्दा विश्विद्यालय के खंडहरों में ही हुई थी।

यकीनन, प्राचीन नालन्दा विश्वविद्यालय की गौरवशाली भूमि पर कदम रखते ही अत्यंत आनंद की अनुभूति हुई। प्रवेश द्वार से ही पर्यावरण की हरियाली( “Come farward to preserve heritage”) चारों ओर इस विश्वविद्यालय के भग्नावशेषों में भी जान डाल रही थी। अत्यंत सुनियोजित ढंग से और विस्तृत क्षेत्र में लाल ईंट पथरों से बना हुआ नालंदा विश्वविद्यालय प्राचीन दुनिया का संभवत: पहला विश्वविद्यालय था, जहां न सिर्फ देश के, बल्कि विदेशों से भी छात्र पढ़ने आते थे। इस विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम ने 450 ई. में की थी। जो पटना से लगभग 90 किलोमीटर की दूरी पर स्थापित है।

12वीं शताब्दी में तुर्क सनकी शासक बख्तियार ख़िलजी ने इस विश्विद्यालय को जलाकर नष्ट कर दिया। पर, अभी भी इसके भग्नावशेष इसके स्वर्णिम अतीत की गाथा सुनाते इसके वैभव का एहसास कराते हैं।
इस बीच दोपहर का समय होने के बाद भी मौसम अनुकूल था। ज्यादा धूप और गर्मी ने हमें परेशान नहीं किया। झारखण्ड में तेज बारिश का कुछ असर इधर भी देखने को मिला। इसलिये हम सबने इस ऐतिहासिक धरोहर में कुछ अच्छे पल भी बिताये।

और अंतत.. हम अपने मंजिल तक सुरक्षित पहुँच गए जहां हजारीबाग का खूबसूरत और राहत पहुँचाने वाला मौसम मेरे अपनों के साथ खुले बाँहों से स्वागत करने को पहले से तैयार बैठा था।