प्रकृति की गोद में बसा मेरा यादवपुर हमेशा अपनी ओर खींचता है: आमोद
धनबाद शहर से सटा होने के कारण यादवपुर, गांव न होकर एक कस्बा जैसा प्रतीत होता है, जहाँ शहर का प्रभाव साफ झलकता है। यह प्रकृति की गोद में भी बसा हुआ है। इसके चारों तरफ जंगल और पहाड़ हैं। गांव के चारों तरफ प्राकृतिक नदियाँ हैं जो पूरी तरह से बारिश पर निर्भर करती हैं।
लेखक: आमोद कुमार शर्मा/बोकारो स्टील प्लांंट के पूर्व मैनेजर, अपने यादवपुर गांव से


भारत के अन्य गांवों की तरह मेरा भी एक छोटा-सा गांव है, जिसका नाम यादवपुर है। मेरे गांवो का पौराणिक नाम भट्टडीह है। ये गांव झारखँड राज्य के धनबाद रेलवे स्टेशन से उत्तर की ओर मात्र 10 किलोमीटर की दूरी पर है। यह गांव नेशनल हाईवे-2 से महज 03 किलोमीटर की दूरी पर है। शहर से सटा होने के कारण यह गांवो न होकर एक कस्बा जैसा प्रतीत होता है, जहाँ शहर का प्रभाव साफ झलकता है। यह प्रकृति की गोद में भी बसा हुआ है। इसके चारों तरफ जंगल और पहाड़ हैं। गांव के चारों तरफ प्राकृतिक नदियाँ हैं जो पूरी तरह से बारिश पर निर्भर करती हैं।
पठार के बीच बसे मेरे इस खूबसूरत गांव में 60 बरसों से माध्यमिक और हाई स्कूल दोनों चल रहे हैं। यहां ब्रह्मभट्ट समाज के 150 से ऊपर घर हैं और लगभग हर घर की आर्थिक स्थिति कमोबेश अच्छी है। ज्यादातर लोग सरकारी और गैर सरकारी नौकरियों में कार्यरत हैं। हमारे गांव के अधिकतर लोग वकालत पेशे में हैं। आसपास BCCL, CCL की कोलियरी होने के कारण गांव के लोगों के लिए रोजगार की समस्या एकदम नहीं है और वे अपनी-अपनी योग्यता के अनुसार काम की तलाश कर लेते हैं।
हमारे गांव में रोजमर्रे की तमाम सुविधाए हैं जो आम तौर पर शहर में होती हैं। इसी वजह से धनबाद में जमीन होने के बावजूद मैंने और मेरी धर्मपत्नी डॉ. संध्या रानी ने रिटायरमेंट के बाद की जिंदगी इस शहरी गांव में बिताने का फैसला किया है। बिजली, सड्क की सुविधा बहुत पहले से है।
गांव में अलग-अलग देवी-देवताओं के मंदिर भी हैं। गांव में सांस्कृतिक गतिविधियां भी अक्सर होती रहती हैं जिससे गांव के निवासियों का मनोरंजन हो जाता है। इस मौके पर बच्चे, बूढे, जवान सभी को समय-समय पर अपनी सांस्कृतिक कला का प्रदर्शन करते देखा जा सकता है। दुर्गापूजा के दौरान यहां 10 दिनों तक हर तरह के कार्यक्रम का आयोजन होता है।
मैं और मेरा परिवार अपने गांव से भावनात्मक रुप से जुड़ा हुआ है। जहां तक महिलाओं की स्थिति का संबंध है मेरे गांव में पर्दाप्रथा अपने रुढिवादी रुप में कभी नहीं रहा। यादवपुर की महिलाएं गांव में होने वाले हर कार्यक्रम का आनंद उठाती हैं। मुझे आज भी याद है कि जब बचपन में रामायण की कथा होती थी, सीताहरण के समय महिलाएं रोने लगती थीं, भाव विह्वल हो कर कथा का आनन्द लेती थीं। अभी वर्तमान में हमारे गांव की पंचायत से इसी गांव की महिला मुखिया के चुनाव में जीती जो संयोग से अपने ही समाज की हैं। राजनीतिक और सामाजिक रुप से सक्रिय इन मुखिया का नाम श्रीमति मधु सिंह है। इनका मायका बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के मीनापुर ब्लॉक के मथुराडीह गांव है।
दरअसल, मैं अपने गांव से भावनात्मक लगाव के कारण रहना चाहता हूं। अपने गांव में जीवन की दूसरी पारी में सामाजिक कार्यों और पर्यावरण के कार्य से जुड़ने की प्रबल इच्छा है। आप सबको कभी मौका मिले तो मेरे गांव अवश्य पधारिए।