अयोध्या : मुझे कोई पहचानने वाला नही मिला
जितेंद्र शर्मा भट्ट-फैजाबाद
वक्त ने बहुत कुछ बदल दिया, आज मुझे कोई पहचानने वाला नही मिला, रेलवे स्टेशन पर पुरानी दुकानों पे बैठने वाले चेहरे बदल चुके
वर्षो बाद आज अयोध्या रेलवे स्टेशन पर उतरना हुआ। इस नगर में मेरे छात्र जीवन के कई साल गुजरे थे। अक्सर मैं अपने मित्रो के साथ स्टेशन पर घूमने आता रहता था।
पर वो वक्त गुजरे आज पन्द्रह साल हो गए | ये शहर जहा मेरे दोस्त रहते थे ,छोटी छोटी खुशी में भी जी भर के हम सब हस लेते थे | यहाँ के मेलो का महीनो से इन्तजार रहता था , और बिना पैसे के भी मेले का दस चक्कर लगा के खुश हो जाते थे |
पर वक्त ने बहुत कुछ बदल दिया, आज मुझे कोई पहचानने वाला नही मिला ,रेलवे स्टेशन पर कुछ नई दुकाने खुल गयी पुरानी दुकानों पे बैठने वाले चेहरे बदल चुके है ,रेल फाटक बन्द करने वाले रग्घू दादा भी नही रहे | गेट के दाए एक कमजोर सीे बुढ़िया अपनी पोती के साथ बच्चों के चूरन व् कम्पट बेचती थी जो हम सब को देख कर दो चार रटे रटाये इंग्लिश के शब्द बोलकर हँसती थी ,वर्षो तक वही कुछ शब्द ही सुनता रहा पर इस बार वहा वो टूटी फूटी इंग्लिश के शब्द बोलने वाला भी कोई नही रहा ,मैदान वही पर खेलने वाले बच्चे और थे | अयोध्या स्टेशन वही है पर शाम को उस पर टहलने वाले मेरे परिचितो में से अब एक भी नही .
मैं उन सबो को जोर जोर से बुलाना चाह रहा था पर अब कौन सुननेवाला था ,मैं भावुक हो गया आज ये शहर कुछ अजनबी सा लगा कुछ अलग सा , शायद यहां के लिए अब मैं बेगाना हो चूका हूँ . मेरे पास उन गुजरी हुई यादो के सिवाय कुछ नही बचा .
आज अपने बड़े होने के एहसास ने बड़ी तकलीफ पहुचाया . सच ही लोग कहते है की वक्त मुट्ठी की बालू की भाति ऐसे सरक जाता है की मुट्ठी बाधे इंसान को पता ही नही लगता .