खुद को वीरान कर, विकास-पथ पर दौड़ा मेरा भटपुरा गांव
इस बार मैं एक वर्ष के उपरांत जब अपने गांव गया तो कुछ भी अच्छा न लगा! लगभग सभी घर अब आलीशान हो गए है पर सबके सामने ताले लटके मिले! कुछ घरो मे बुजुर्ग तो मिले पर नए लड़के एक भी नही रहे, पूरे गांव का चक्कर लगाया पर एक अजीब सा सन्नाटा ही दिखा!
जितेन्द्र शर्मा भट्ट/ ग्राम-भटपुरा/फ़ैज़ाबाद
भगवान राम की चरणपादुका (खड़ाऊ ) को सिंहासन पर रखकर उनके छोटे भाई भरतजी ने 14 वर्ष तक जिस स्थल पर तपस्या की उस ‘नन्दी ग्राम (भरतकुंड’) की दूरी मेरे गांव से महज 8 किलोमीटर है तथा ग्रन्थों मे वर्णित “तमसा नदी ” जिसके तट पर अयोध्यावासियों को सोता हुवा छोड़कर प्रभु राम 14 वर्षो के लिए वनवास चले गए थे उस पावन भूमि की दूरी भी मेरे गांव से महज 5 किलोमीटर ही है !


किंतु इस बार मैं एक वर्ष के उपरांत जब अपने गांव गया तो कुछ भी अच्छा न लगा! लगभग सभी घर अब आलीशान हो गए है पर सबके सामने ताले लटके मिले! कुछ घरो मे बुजुर्ग तो मिले पर नए लड़के एक भी नही रहे, पूरे गांव का चक्कर लगाया पर एक अजीब सा सन्नाटा ही दिखा! मेरा बचपन जिन पेड़ो पर उछलते -कूदते गुजरा था उनकी डालियां जैसे बच्चो के आने का इंतजार कर रही हो !
आम के पेड़ों के नीचे बच्चो की दौड़ एवम आपसी लड़ना-झगड़ना सब बीते दिनों की बात हो चुकी है ! शायद आने वाले समय मे लोग चर्चा करेंगे यहाँ एक गांव हुवा करता था, जहां अब खंडहर दिख रहे है ! मुझे गांव के विकास से बड़ी खुसी है पर जो स्थान मेरी पहचान का हिस्सा है, मेरी बचपन की यादों का खजाना है, जिनकी गलियों में निर्दोष बचपन गुजरा उसे इस तरह उजड़ते हुवे देखकर तकलीफ भी बहुत है! पर क्या किया जा सकता है? समय का बदलाव जो नियति का हिस्सा बन चुका है उसे भला कौन रोक सका है !
(लेखक जितेंद्र कुमार शर्मा दिल्ली के निकट बुलन्दशहर के के.डी इंटर कालेज में लेक्चरर हैं)