क्या फेसबुक ग्रुप के लिए यह सब संभव है?
लोकतंत्र में एक ही समाज के अनगिनत ग्रुप हो सकते हैं। जैसे मोदी समर्थकों के सैकड़ों ग्रुप चल रहे हैं। जैसे अख़बारों पर पाबंदी नहीं लगाई जा सकती वैसे ही फेसबुक ग्रुप के सृजन को रोका नहीं जा सकता।
2. पहले BBW ग्रुप की बात। जब फेसबुक क्रांति शैशवावस्था में थी तो हमारा भी ध्यान इस डिजिटल मंच की उपयोगिता पर गया। आठ साल पहले हमने चंद स्वजनों को जोड़कर BBW group आरंभ किया जो हमारी कल्पना, प्लानिंग, एडमिन टीम और मेंबर्स की मेहनत और रुचि की वजह से नित्य लोकप्रियता का सोपान चढ़ता चला गया। हम इस मंच पर हर घर का सुख दुख साझा करने लगे। दूसरों की तरक्की से अपने को खुश होना जरूरी बताया और दूसरों के गम में मिलकर दुआएं की। तो स्वजनों को यह ग्रुप भा गया।
3. फेसबुक के नियम के मुताबिक किसी भी फेसबुक उपयोगकर्ता की फ्रेंडलिस्ट में अधिकतम 5 हजार मित्र ही रह सकते। तो फिर यह ग्रुप 15 हजार का आंकड़ा कैसे पार कर गया? जाहिर है, इस ग्रुप में सदस्यों की संख्या बढ़ाने में अन्य एडमिन और सदस्यों ने अपने फेसबुक मित्रों को BBW से जोड़ा तब यह कारवां 15 हजार के पार पहुंचा। इसी तरीके से अन्य फेसबुक ग्रुपों का भी विकास होता है।

5. तो क्या अलग अलग ग्रुप से लाभ है? लोकतंत्र में एक ही समाज के अनगिनत ग्रुप हो सकते हैं। जैसे मोदी समर्थकों के सैकड़ों ग्रुप चल रहे हैं। जैसे अख़बारों पर पाबंदी नहीं लगाई जा सकती वैसे ही फेसबुक ग्रुप के सृजन को रोका नहीं जा सकता।
6. सवाल है कि समाज किस ग्रुप को पसंद करे? किस ग्रुप में रहे? यह सब कुछ ग्रुप की एडमिन नीति पर निर्भर करता है। अगर संस्थापक एडमिन और अलग-अलग राज्यों के उनके साथी एडमिन कल्पनाशील, शांतिप्रिय, निष्पक्ष और भाषा के जादूगर हैं तो फिर उस ग्रुप की गाड़ी हर तरह से दौड़ेगी। सदस्यों में ग्रुप के हर पोस्ट का बेसब्री से इंतजार रहेगा।
7. आखिरकार एडमिन कौन बन सकता? एडमिन एक भरोसे का गैर वेतनभोगी पद है जिसके लिए व्यक्ति को जिंदगी का अमूल्य पल समाज को देना पड़ता है। एडमिन की थोड़ी सी भी चूक ग्रुप एडमिन को अदालती कटघरे में खड़ा कर सकती है।
8. यकीन मानिये जो ग्रुप समाज के बदलाव की ताजी हवा के साथ सोशल ग्रुप चलाता है उसके सदस्य भला कहीं और क्यों जाएंगे? जो ग्रुप समाज के हर मानदंड पर सदस्यों को पसंद आएगा वही इस प्रतिस्पर्धा के दौर में टिक पाएगा। मैं स्वयं चंद ग्रुप का ही सदस्य हूँ। कारण साफ है जिनकी नीतियां और भाषा अच्छी नहीं लगी उस ग्रुप को चुपचाप बिना कहे अलविदा कह दिया।
आशा है फेसबुक ग्रुपों के विलय की विवशता को आप अच्छे से समझ गये होंगे। हां, जाति के नाम पर निबंधित या गैरनिबंधित संगठन आपस मे विलय आसानी से कर सकते क्योंकि उनके समक्ष फेसबुक की तरह तकनीकी परेशानियां नहीं हैं। बस इसके लिए उन्हें एक-दो मीटिंग करने की जरूरत है।
आपका: राय तपन भारती, संस्थापक, BBW ग्रुप
पेशे से 34 साल से पत्रकार।
Comments on BBW group on facebook:
Dilipkumar Pankaj: बिल्कुल सही तर्क है सर। आपने बड़ी कुशलता व स्पष्टता से तकनीकी बारीकियों को उजागर किया है। इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ कि किसी पोस्ट को बिना पूरा पढ़े और समझे कोई कमेंट नहीं करना चाहिए।
Nirupma Sharma: आज सुबह उठकर सबसे पहले मै यह पुरा लेख पढी हूं, और यह बिल्कुल सही है बिना पुरा पढे अपना राय नही देना चाहिए। रही बात इस ग्रुप की सफलता की तो मेरा मानना है ,इस ग्रुप के संस्थापक होने के नाते आपने महिलाओं की दर्द को समझा है उन्हे सम्मान दिया है,उन्हे लिखने का अपनी बात समाज तक पहुचाने का मौका दिया है ,कथनी और करनी में अंतर नही हैा समाज के होनहार नवयुवक युवतियों का समाज को पता चलता है जिससे वर वधु ढुंढना आसान होगया है।
ग्रुप बडा है तो अच्छा होगा यह जरूरी नही लेकीन BBW के एक एक सदस्य कोहिनूर है। समय समय पर आप तरह तरह की जानकारी देते रहते है आज फेसबुक की तकनिकी जानकारी के लिए धन्यवाद।
Anirudh Choudhary: आपने तर्क संगत बाते लिखी हैं । आभार ।
Awadhesh Roy: आपका यह पोस्ट सरहनीय है और साथ ही एक मार्गदर्शन भी |
J Shankar Sharma: कुछ लोग रचना न पढ़कर, रचनाकार का नाम पढ़कर, त्वरित प्रति क्रिया देते हैं, जिससे यह स्थिति उत्पन्न होती है.
यदि लेख पढ़कर टिप्पणी की जाय,तो लेखक भी अपना मूल्यांकन कर पाता है.