अध्यात्म से जोड़ते एक युवा ब्रह्मभट्ट संन्यासी !
अभी तक 12 राज्यों में संगीतमय श्रीराम कथा का प्रवचन कर चुके हैं वे इस कार्य को प्रभु की सेवा मानकर करते हैं

वेदांत का ज्ञान हो या योग का कुशल अभ्यास अथवा हो भावपूर्ण संगीत का गान इन सब पर अच्छा-खासा अधिकार रखते हैं। भगवान श्रीराम को ईष्ट एवं अपना आदर्श मानने वाले स्वामी रामशंकर बहुत ही रोचकता एवं सामाजिक उपयोगिता से युक्त संगीतमय श्रीराम कथा के सुरीले प्रवचनकार हैं। अभी तक 12 राज्यों में संगीतमय श्रीराम कथा का प्रवचन कर चुके हैं वे इस कार्य को प्रभु की सेवा मानकर करते हैं।स्वामी राम शंकर को संगीत से बेहद लगाव है। इन दिनों इंदिरा कला संगीत विश्विद्यालय में निवास कर संगीत को गहराई से जानने-सीखने एवं समझने हेतु संगीत गुरु श्रीनमन दत्त से तालीम प्राप्त कर रहे हैं।
माथे पर वैष्णव तिलक, शरीर में गेरू वस्त्र युक्त परिधान में विश्विद्यालय परिसर के भीतर एक युवा संन्यास का अध्ययनरत होना समस्त विद्यार्थी जनो के लिये किसी कौतुहल से कम नहीं है। स्वामी जी कहते हैं, संगीत तो हम किसी अन्य शहर में रहकर भी सिख सकते थे किंतु वहा दो चीजे कभी नही मिल पाती, पहली खैरागढ़ सदृश्य संगीत का वातावरण एवं दूसरी इतनी बड़ी संख्या में युवाओ का संग जिनके साथ हमें ढेर सारे विचार–विमर्श करने का सहज अवसर यहाँ सुलभ है। उनका कहा है,” मेरा सपना था कि युवाओ के बीच कुछ वर्ष जीवन जी सकू क्योंकि तभी हमें पता चलेगा कि हमारे देश के युवा पीढ़ी किस मानसिकता के साथ जीवन जी रहे है, जिसके अनुसार भविष्य में मुझे अपने युवा साथियो के साथ मिल कर किस प्रकार कार्य करना है, ये बात हम पता कर रहे हैं।”
”एक बात हमने महसूस किया कि सन्यासी के रूप में कुछ समय सामन्य जन के मध्य व्यतीत करने से सन्यास के विषय में एक बेहतर सम्प्रेषण लोगो के बीच बन पायेग इस उद्देश्य हेतु भी मेरा विश्विद्यालय प्रवास सार्थक सिद्ध होगा। स्वामी राम शंकर का जन्म
सन 1987 को उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के ग्राम खजुरी भट्ट में आपका जन्म हुआ। गोरखपुर के दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय से बी काम की पढाई करते समय ही स्वामीजी ने सन्यास ले कर, सनातन धर्म-संस्कृति के अध्ययन में तल्लीन हो गए।
पिछले 8 सालों में भारत वर्ष के अनेक प्रांतो में स्थित गुरुकुलों में रह कर वेद, पुराण, एवं योग शास्त्र का अध्ययन कर वर्तमान में एशिया के सर्वप्रथम सबसे बड़े संगीत विश्वविद्यालय ” इन्दिरा कला संगीत विश्विद्यालय ”खैरागढ़ , में दाखिला ले कर भारतीय संगीत शास्त्र का साहित्यिक एवं प्रायोगिक अध्ययन कर रहे हैं।

अब रामप्रकाश से स्वामी रामशंकर दास हो गये स्वामी जी के ह्रदय में विचार प्रगट हुआ की सनातन धर्म का ठीक प्रकार से अध्यन करना चाहिए जिसके फल स्वरुप स्वामी जी अयोध्या छोड़ कर गुजरात चले गये वहा आर्य समाज के ”गुरुकुल वानप्रस्थ साधक ग्राम आश्रम ” रोजड़ में रह कर योग दर्शन की पढ़ाई व साधना किये l

अभी भी आपके भीतर की योग विषयक पिपासा शांत नहीं हो पायी थी, जिसके कारण ही योग को समझने के लिये योग के प्रसिद्ध केंद्र ” बिहार स्कूल ऑफ़ योगा” मुंगेर ( रिखिआ पीठ ) में फरवरी 2013 से मई 2013 तक साधना किये l
आगे अपनी पिपाशा शांत करने हेतु विश्व प्रसिद्ध ”कैवल्य धाम” योग विद्यालय लोनावला पुणे ,महाराष्ट्र में रह कर जुलाई 2013 से अप्रैल 2014 तक डिप्लोमा इन योग के पाठ्यक्रम में रह कर योग से सम्बंधित पतंजलि योग सूत्र , हठप्रदीपिका , घेरण्ड संहिता आदि प्रमुख शास्त्रो का अध्यन कर स्वयं में शांति का अनुभव करने के फलस्वरूप पूज्य स्वामी जी वर्तमान समय में प्रभु श्री राम के चरित्र को रोचकता के साथ संगीतमय प्रस्तुति कर समाज के नागरिको को सत्यनिष्ठ , सदाचारी बनने की प्रेरणा प्रदान कर रहे है,
स्वामी जी युवाओ के साथ रहने एवं उनके साथ, उनके लिये कार्य करने में विशेष रूचि रखते है l
बकौल स्वामी राम शंकर आज धर्म का अत्यंत बिगड़ा रूप लोगो के मनमस्तिष्क में व्याप्त हो चुका है जिसे दूर करना अत्यंत आवश्यक हो गया है और यह तभी संभव है जब हम युवाओ के साथ धर्म से जुड़े मुख्य विन्दुओ पर स्वस्थ चर्चा करे एवं उनके भीतर व्याप्त धर्म सम्बन्धी गलतफहमियों को निदान हो, तभी जा कर अखंड भारत के अंतिरिक अखंडता को हमसब कायम रख सकेंगे l