अकेले सिमटती जिंदगी के लिए जिम्मेवार कौन?
मुंबई, दिल्ली बहुत लोग अवसाद की जिंदगी जी रहे, केवल अपने परिवार की गाथा गाने वालों से भी लोग दूरी बना लेते
राय तपन भारती/नई दिल्ली
वे अब बेहद अकेला हैं। घर में केवल पति-पत्नी। तीनों बच्चे दूसरे शहरों में। रिटायरमेंट के बाद अब कोई मिलने भी नहीं आता। समय आखिर कैसे कटे? नौकरी में रहने पर दिन भर व्यस्तता रहती थी। एक दिन वे फोन पर भावुक हो गए और कहा- तपनजी, मैंने नौकरी में रहकर बड़ी गलती की। मैं केवल नौकरी और परिवार तक सिमट गया। उस दौरान किसी का घर आना बहुत खटकता था। व्यस्तता में आगुंतकों के साथ समय तालमेल बिठाने का कभी सोचा ही नहीं। तब अपने सगों से भी मैं दूर होता चला गया।
कई बार ऐसा होता है कि आसपास सबके होते हुए भी सन्नाटा सा लगता है। जिंदगी ने कब हमें परिवार से हटकर अकेला रहना सिखा दिया, यह कहना मुश्किल है। पर यह अकेलापन अब रिश्तों को खाने लगा है, यह सब महसूस करने लगे हैं। छोटे से बच्चों से लेकर बड़े-बूढ़े तक। मेरी मां आजकल मेरे पास ही रहती है। वे अक्सर हमें कहती हैं- यहां लोग मिलने कम आते हैं…बहरहाल और घरोॆं की तुलना में इक्के-दुक्के रिश्तेदार आ भी जाते पर पड़ोस के कई घरों में वह भी नहीं है। आखिर क्यों?
सालों पहले गर्मी की छुट्टियों में जब घर पर मेहमानों के आने का तांता लगता था, मैंने मां को कहते सुना था, ‘घर पर जब तक लोग आएं-जाएं नहीं, घर सूना-सूना सा लगता है। परिवार तो लोगों से ही बनता है।’ मेहमानों के आने का मतलब था मां का चौबीसों घंटे रसोई में खटना। पर वे इससे परेशान होने की बजाय उत्साहित रहतीं। वह एक दौर था, यह एक दौर है।
तब मेहमान बुलाए नहीं जाते थे और ना ही उनके आने पर जाने की कामना की जाती थी। अब मेहमान बुलाए जाते भी हैं तो आते ही उनके जाने की कामना होने लगती है। इन वर्षों में कितना कुछ बदल गया है। रिश्तों का दायरा सिमटता जा रहा है और कुछ रिश्ते तो अपना अर्थ भी खोने लगे हैं।
केवल अपने परिवार की गाथा गाने वालों से भी लोग दूरी बना लेते हैं। पड़ोसी कौन कहे लोग अपने चचेरे और मेमेर-फुफेरे भाई-बहनों के लिए भी समय नहीं निकालते। तभी तो बंगलोर, मुंबई, दिल्ली बहुत सारे लोग अवसाद की जिंदगी जी रहे हैं। इससे बढ़िया छोटे शहर हैं जहां सगे नहीं हैं तो पड़ोसी तो कम से कम आपका हालचाल पूछ लेता है।
Laliteshwar Rai, Patana : जिंदगी में अकेला हो जाने के लिए हमं सब खुद जवाबदेह हैं।
Suman Rai, Chennai : शहरी जीवन की बहुत बड़ी त्रासदी है ..कि लोग भीड़ में भी अकेले हैं। अब अतिथि नहीं आते हैं। अब तो गेस्ट आते हैं।
अतिथि का मतलब तो होता है जिसके आने की तिथि न मालूम हो ..अब अगर कोई ऐसे आ जाये तो लोग पसंद नहीं करते हैं। हम सब अपने एकाकीपन के लिए खुद जिम्मेवार है


व्यक्ति दर व्यक्ति की अपनी निजी सोच इसके कारणों का मूल होती हैं।
कुछ इंसानों के पास इस विकल्प को चुनना कई बार उनकी विवशता को भी दर्शाता है। ऐसे ही कुछ लोगों के लिये निम्नलिखित विचार इस अवसाद से निकलने का पर्याय बन सकते हैं।
Prabhakar Sharma, Dhanbad : मुझे लगता है कि जिन्दगी में बहुत कुछ हासिल कर लेने की बढ़ती स्पर्धा ने हमें अपनों से दूर कर रहा है। अन्य रिश्तो की तो बात ही अलग है, अब तो पिता-पुत्र, भाई-बहन रिस्तो की दूरियों का स्पष्ट अनुभव कर रहे हैं। संयुक्त परिवार की सोच तो अब कोसों दूर रहती है। बिरले कुछ लोग हैं जो संयुक्त परिवार के प्रचलन को बरकरार रखे हैं क्योकि वे गॉव घर से जूड़े हैं। ये सच है हम अपनों से जितने दूर होते जायेगे रिश्तों के गांठ उतने ही कमजोर होते जायेगे।


Jitendra Hitaishee, Alladhabad : Jo swaym akele rahna chahte h vahi akele h,varna 2 akele bhi 2 ho jate h,or logo ko apne swbhav k anusar koi na koi kam jarur karte rahna chahiye,or kuch na kar sake tho apne mahhule k jitne bhi akele log h unki list bana kar sabhi se sampark bana sakte hain.
Sunil Sharma : sir, yeh bade sahron ki jindagi hain kya karen itna compettiton hai agar meet na karen toh bhi pareshan agar karen toh logon se dur kabhi kabhi purane jamane ki jindagi dekhta hun toh lagta hai kya jindagi thi raja maharajon k time bada sakun deta hai hariyali woh ekta but ab sab tutha ja raha hai
Onkarnath Sharma : Hum bachapan se parthe aye hai lekin hum samaj mahi paye “Boya pade babul ka to aam kaha se paye”
Bhatt Sharad (Lucknow): Insaa khud akele jimmedaar to nahin lagtaa.Samaaj me bade addhayyan aur nivaaran ki sakht jaroorat hai