महाकवि भट्ट पद्माकर ऐसे सरस्वतीपुत्र जिन पर लक्ष्मी की कृपा सदा रही
सुधाकर पांडेय ने लिखा है- “…पद्माकर ऐसे सरस्वतीपुत्र थे, जिन पर लक्ष्मी की कृपा सदा से रही। अतुल संपत्ति उन्होंने अर्जित की और संग-साथ सदा ऐसे लोगों का, जो दरबारी-संस्कृति में डूबे हुए लोग थे। …कहा जाता है जब वह चलते थे तो राजाओं की तरह (उनका) जुलूस चलता था और उसमें गणिकाएं तक रहतीं थीं।..”
Written by Mahavir Prasad Bhatt/ Ara, Bihar

पद्माकर कवीश्वर एक प्रतिभा सम्पन्न जन्मजात कवि थे। इन्हें आशु-कवित्त-शक्ति अपने पहले के कवियों और संस्कृत-विद्वानों की सुदीर्घ वंश-परम्परा से ही प्राप्त थी। उनके पूरे कुटुंब का वातावरण ही कवितामय था। उनके पिता के साथ-साथ उनके कुल के अन्य लोग भी बहुत समादृत कवि थे, अतः उनके कुल / वंश का नाम ही ‘कवीश्वर’ पड़ गया था। मात्र 9 वर्ष की उम्र में ही पद्माकर उत्कृष्ट कविता लिखने लगे थे। जयपुर नरेश महाराज जगत सिंह को पद्माकर ने अपना परिचय कुछ इस तरह दिया था-
भट्ट तिलंगाने को,
बुंदेलखंड-वासी कवि,
सुजस-प्रकासी ‘पद्माकर’ सुनामा हों
जोरत कबित्त छंद-छप्पय अनेक भांति,
संस्कृत-प्राकृत पढ़ी जु गुनग्रामा हों
हय रथ पालकी गेंद गृह ग्राम चारू
आखर लगाय लेत लाखन की सामां हों
मेरे जान मेरे तुम कान्ह हो जगतसिंह
तेरे जान तेरो वह विप्र मैं सुदामा हों।
कवि का ठाठबाट, राजसम्मान और दानशीलता: पद्माकर राजदरबारी कवि के रूप में कई नरेशों से सम्मानित किये गए थे अतः वे अनेक राजदरबारों में सम्मानपूर्वक रहे। सुधाकर पांडेय ने लिखा है- “…पद्माकर ऐसे सरस्वतीपुत्र थे, जिन पर लक्ष्मी की कृपा सदा से रही। अतुल संपत्ति उन्होंने अर्जित की और संग-साथ सदा ऐसे लोगों का, जो दरबारी-संस्कृति में डूबे हुए लोग थे। …कहा जाता है जब वह चलते थे तो राजाओं की तरह (उनका) जुलूस चलता था और उसमें गणिकाएं तक रहतीं थीं।..” ‘हिम्मत बहादुर विरुदावली’ की भूमिका में दीन जी ने लिखा है -” …पद्माकर ने अपनी काव्य-शक्ति के प्रताप से (एक अवसर पर तो) 56 लाख रुपये नक़द, 56 गाँव और 56 हाथी इनाम में पाए थे।..रघुनाथ राव के पन्ना और जयपुर के रनिवासों में पद्माकर का पर्दा न था। उत्सवों और त्योहारों के अवसर पर राजसी श्रृंगार किये असूर्यपश्या कई कमनीय-कान्ताओं को उन्होंने नज़दीक से देखा था।..” समय-समय पर नागपुर, दतिया,सतारा, सागर,जैतपुर, उदयपुर , ग्वालियर, अजयगढ़ और बूँदी दरबार की ओर से उन्हें बहुत सम्मान और धन आदि मिला। पन्ना महाराज हिन्दुपति ने उन्हें पांच गाँव जागीर में दिए। जयपुर नरेश सवाई प्रताप सिंह ने एक हाथी, स्वर्ण-पदक, जागीर तथा ‘कवि-शिरोमणि’ की उपाधि दी और बाद में जयपुर राजा जगत सिंह ने उन्हें दरबार में धन-संपदा और आदर दिया और साथ में कुछ गांवों की जागीर भी। “कहते हैं कि पद्माकर अपनी उत्तरावस्था में तो आश्चर्यजनक रूप से इतने धनाढ्य व्यक्ति हो गए थे कि ज़रुरत पड़ने पर कई राजाओं / राजघरानों तक की ‘आर्थिक-सहायता’ स्वयं दरबारी कहे जाने वाले इस महाकवि ने की।” उनके वंशज गुरु कमलाकर ‘कमल’ और भालचंद्र राव इस कोण से पद्माकर को मुग़ल-युग के भामा शाह जैसा मानते हैं जिन्होंने महाराणा प्रताप को मेवाड़ की सैन्यशक्ति पुनर्गठित करने के लिए अपनी संपत्ति दान कर दी थी।
ग्रन्थ-रचना
अजयगढ़ के गुसाईं अनूप गिरी (हिम्मत बहादुर) की काव्यात्मक-प्रशंसा में उन्होंने ‘हिम्मत-बहादुर-विरूदावली’, जयपुर नरेश प्रतापसिंह के सम्मान में ‘प्रतापसिंह-विरूदाली’ और सवाई जगत सिंह के लिए ‘जगत-विनोद’, ग्वालियर के शासक दौलतराव सिंधिया के सम्मान में आलीजाप्रकाश, जयपुर नरेश ईश्वरी सिंह की प्रशस्ति में ‘ईश्वर-पचीसी’ जैसे सुप्रसिद्ध कविता-ग्रंथों की रचना की। यों पद्माकर जी रचित ग्रंथों में सबसे जाने माने संग्रहों में – हिम्मतबहादुर विरुदावली, पद्माभरण, जगद्विनोद, रामरसायन (अनुवाद), गंगालहरी, आलीजाप्रकाश, प्रतापसिंह विरूदावली, प्रबोध पचासा, ईश्वर-पचीसी, यमुनालहरी, प्रतापसिंह-सफरनामा, भग्वत्पंचाशिका, राजनीति, कलि-पचीसी, रायसा, हितोपदेश भाषा (अनुवाद), अश्वमेध आदि प्रमुख हैं।