बेटी को इतना पढा दें कि दहेज पर कोई बात ही न करे: नेहा
दहेज हमारे समाज का ऐसा अभिशाप है जिसके ऊपर अगर पूरी किताब भी लिख दी जाए तो कम होगा। लेकिन यहाँ ज़रूरत है सिर्फ उन लोगों तक ये बात पहुँचाने की, अगर आपको सच में केवल अच्छी और पढ़ी लिखी बहू चाहिए तो आप सिर्फ उतने तक ही सीमित रहें।
नेहा कुमार/नई दिल्ली
” हमें कुछ नहीं चाहिए, हमारी कोई मांग नहीं है। हमें सिर्फ लड़की अच्छी और पढ़ी लिखी चाहिए बस जो घरेलू हो, परिवार को ले के चलने वाली हो और वक़्त पड़ने पर हमारे बेटे के साथ बाहर भी कदम से कदम मिलाकर चल सके “। ये सुनने में कितना अच्छा लगता है ना, लेकिन होता बिल्कुल इसके विपरीत है।
आप तिलक कितना चढाएंगे, तिलक में सामान क्या क्या आएगा, लड़के को क्या देंगे, बारातियों का स्वागत कैसे करेंगे, खान पान की व्यवस्था कैसी होगी, बारातियों की बिदाई कैसे होगी। जब इतने सारे सवालों का बोझ लड़की के बाप के कंधे पे डाल ही दिया जाता है तो अब मांगने के लिये बचा ही क्या! हमने तो कुछ ना मांग कर भी लड़की के पिता से सब कुछ ले लिया। अब जिस लड़की के पिता के पास इतनी पूर्ति करने की क्षमता नहीं है तो उस बेचारी लड़की की आंखों में शादी के सपनों की जगह पिता की बेबसी के आंसू अपनी जगह बना लेते हैं।
जैसे तैसे इधर उधर से व्यवस्था कर के जब बेटी का पिता अपनी सामर्थ्य अनुसार बेटी की बिदाई कर देता है तो अब ससुराल में शुरु होती है उसकी बेटी की कहानी। जहां हर कदम पर उस लड़की को ये जताया जाता है कि शादी करके उसको अपने घर की बहू बना के उस लड़की पर बहुत बड़ा उपकार किया गया है। जैसे अगर वे लोग उसको अपनी बहू ना बनाते तो उसकी शादी कहीं हो ही ना पाती। उस बहू को अपने ससुराल में सब कुछ मिलकर भी सब कुछ खालीपन होता है जैसे वहाँ उसका कुछ है ही नहीं। वो लड़की तो बस सब कुछ सुनकर भी हँसते हुए सबकी खुशियों और जरूरतों का ख्याल रखती है कि दहेज के साथ साथ उसके माँ बाप द्वारा दिये संस्कारों पर कोई उंगली ना उठा दे।
इसलिये तो बाप और बेटी में एक चीज़ समान होती है, “दोनो को अपनी गुड़िया से बहुत प्यार होता है”
दहेज हमारे समाज का ऐसा अभिशाप है जिसके ऊपर अगर पूरी किताब भी लिख दी जाए तो कम होगा। लेकिन यहाँ ज़रूरत है सिर्फ उन लोगों तक ये बात पहुँचाने की, अगर आपको सच में केवल अच्छी और पढ़ी लिखी बहू चाहिए तो आप सिर्फ उतने तक ही सीमित रहें। लड़की के पिता पर अपने बेतुके सवालों का बोझ ना डालें। क्योंकि अगर आप वाकई में केवल पढ़ी लिखी बहू लाएंगे तो वो आपके पूरे परिवार की जड़ को मजबूत कर आपकी आने वाली पीढ़ी को भी शिक्षित बनाएगी क्योंकि तिलक और तिलक का सामान तो केवल क्षणिक मात्र होगा परंतु आपकी बहू द्वारा अपने बच्चों को दी गई शिक्षा जीवन भर के लिये होगी।
हमारे समाज में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो बिना मांगे ही अपनी बेटी को भर भर के दहेज देते हैं।
क्यों!
क्योंकि वो दिखाना चाहते हैं कि उनकी बेटी किसीसे कम नहीं है या दहेज के दबाव में लड़के और लड़के वालो पर ताउम्र उनका दबदबा बना रहेगा। अगर वे ऐसा सोचते हैं तो अपनी बेटी क साथ साथ वे समाज की अन्य बेटियों के साथ भी गलत करते हैं। क्योंकि जितना दहेज लेना गलत है उतना ही दहेज देना भी गलत है।
कुछ लोग ऐसे भी हैं जो बेटी के जन्म के बाद ही ये धारणा बना लेते हैं कि हमारे घर बेटी आ गई है इसलिये अभी से इसके दहेज की व्यवस्था करना शुरु कर दो।
क्यों!
जितना दिमाग और जितना भी आप उसके दहेज के लिये लगा रहे हैं क्यों ना उतना ही आप बेटी की शिक्षा के बारे में सोचें। क्यों ना आप अपनी बेटी को पढ़ा लिखा के इस लायक बना दे कि आपको उसके विवाह के लिये कहीं भटकने की ज़रूरत ना पड़े। लड़के वाले खुद आपसे आपकी बेटी का हाथ मांगने आए।
“दो बेटी को शिक्षा का हथियार
कल को ना हो वो लाचार”
मैं जानती हूँ मेरी इन बातों से आपमे से कई लोग सहमत नहीं होंगे लेकिन यकीन मानिये अगर हम सब मिलकर एक पहल करेंगे तो हमारे समाज में ना किसी बेटी को बेबसी और लाचारी के आंसू बहाने पड़ेंगे और ना ही कोई भी बेटी अपने पिता के लिये बोझ बनेगी।
“बेटे भाग्य से होते हैं
लेकिन बेटियां सौभाग्य से होती हैं “
Comments on facebook BBW group:
Goswami Jyotish Mishra नेहा जी आपका संदेस बहुत ही वास्तविक एवम् सत्य है लोग कहते कुछ और है लेकिन वास्तविकता कुछ और रहता है
Guddu Kumar बात है बहुत सुन्दर लेखन में आच्छा लगता है लेकिन इस तरह कोई भी है जो अपने बिना दहेज प्रथा के शादी कर ली है नेहा जी आप जानते हैं कि हमारे सामाज में एक तरह के दहेज़ मुक्त हो
Ram Adhar Bhatt लेख बहुत अच्छा है किन्तु क्या आप सामूहिक विवाह के लिए तैयार हैं ?
Rajeev Sharma नेहा जो तुम्हारे मन में इस तरह की भावना जगी ये सचमुच हमारे समाज के लिये विचार योग्य है। इस तरह की वेदनाएं न जाने कितने माँ बाप ने झेला होगा। कम से कम अब आगे आने वाले समय में लोग इस तरह की कुरितियों से सजग होकर अपनी बेटी की विदाई खुश होकर सारे तनाव से मुक्त होकर कर सकें

Sumit Ranjan बहुत सही बात है लेकिन सिर्फ बातें करना काफी नही है। इसकी शुरुआत हमे अप्ने घर से करनी पड़ेगी। दहेज विरोधी होने क लिये बातों क अलवा कुछ करना पडेगा और वो है शुरुआत। माफ कीजियेगा अगर किसी को मेरी बात बुरी लगे तो। लेकिन जब ब कोई इस विषय पे बाते करता है तो पेहला सवाल ये है की इसके लिया कदम क्या उठाया गया। प्रधानता विचारो की नही कर्मो की होती है।
Gaurav Bhatt नेहा जी आपको दिल से प्रणाम, मेरी उम्र तो थोड़ी छोटी है लेकिन मैं जब से मंथन में भाग लिया हूँ मैं भी दहेजप्रथा के खिलाफ हो गया हूँ और मैं आसा करता हूं कि मेरे घर में जो भी सादीया हो वो सादी बिना दहेज के हो। इस के लिए मैं हर संभव प्रयास करुँगा। आपकी बातों से सहमत हूँ और मैं इस नेक मुहीम में BBW के हर एक कदम साथ चलने का हर संभव प्रयास करुँ गा और अपने समाज में भी लोगों के बीच इस संदेश को साझा करूंगा। धन्यवाद…

Rewti Choudhary बहुत सुन्दर यूं कहूँ कि उत्कृष् रचना।एक सच्ची बिटिया की भावपूर्ण और श्रद्धा पूर्ण अर्पण अपने जनक को।इस बेटी की विचाराभिव्यक्ति को मेरा नमन।
Ram Sundar Dasaundhi यही तो उपलब्धि है।

Chanchal Rana युवा वर्ग समझ लें तो दहेज़ निश्चित रूप से समाप्त हो जायेगा
आप औरों को भी प्रेरित करें
Dwarika Prasad Sharma दहेज रूपी महिषासुर का अब तो अंत करना ही होगा।। जिसके लिए युवतियों को चण्डी का रुप धरना ही होगा। नारी शक्ति जिन्दाबाद।

Abheeshek Bhatt नेहा जी… आपने दहेज जैसी कुरीति के खिलाफ़ बहुत ही शानदार और मार्मिक लिखा है…इसकी शुरुआत हमें खुद से करनी होगी…जब आपा ठीक तो सब ठीक