बहन रेणुका शुरू से ही तीक्ष्ण बुद्धि की रहीं
रक्षा बंधन के अवसर पर
रवि पी शर्मा/लखनऊ

आज मुझसे मेरी बड़ी बहन रेणुका शर्मा जी के बारे में लिखने को कहा गया। बड़ी असमंजस की स्थिति में हूँ क्या लिखूं हमेशा हम भाई बहन लड़ते झगड़ते हुए एक साथ आज भी हैं। आदरणीय बड़ी बहन रेणुका शर्मा जी शुरू से ही बहुत तीक्ष्ण और विलक्ष्ण बुद्धि की बालिका रहीं।

मुझे याद है जब हम लोग पिता जी की नियुक्ति स्थान बीसलपुर, पीलीभीत के आदर्श स्कुल में पढ़ा करते थे। एक दिन प्रधानाचार्य द्वारा पापा को बुला कर कहा। आपकी बच्ची विलक्षण प्रतिभा की है और में चाहता हूँ इस बच्ची को एक कक्षा आगे की पढाई कराई जाये। और वह अगले ही दिन से एक कक्षा और आगे हो गई हमसे। खेर कोई बात नहीं दीदी….! मैं तो वैसे भी शैतान टिल्लू …. हूँ।
याद आते हैं स्कूल के वह दिन जब अपनी-अपनी तख्ती को चमकाकर हाथ में बस्ता लेकर हम लोग समूह में स्कूल जाया करते थे। बहुउद्देशीय तख्ती पढने के आलावा मारपीट करने और तलवारवाजी के काम आया करती थी। स्कूल के लंच टाइम में खेलने के चक्कर में खाना न खा कर वापसी में किसी छायेदार पेड़ के नीचे अथवा साहू साहब के बड़े से बगीचे में जिसमे अनेक प्रकार के झरने (फाउंटेन) तरह-तरह फलों के पेड़ों छाव में बैठ कर खाया करते थे। शायद में परिचय के उद्देश्य से अब नहीं लिख रहा हूँ। खेर …जो भी बचपन की यादें स्मरण होती जाएगी अवश्य अपनी ख़ुशी के लिए लिखूंगा।
याद है दीदी ….! जल्दी ही घर पहुँच कर हम लोग बस्ता रख कर झुला डालने भागा करते थे। कितनी होड़ लगी रहती थी ब्लाक में उस लोहे के एंगिल पर चढ़ कर बीच में झुला डालने की इस सावन के महीने में…..लेकिन जीत हमेशा टिल्लू की ही होती थी। क्योंकि तुम्हारा भाई अन्य बच्चों से छोटा जरुर था। लेकिन पेंड़ों व अन्य किसी भी स्थान पर चढ़ने में महारत हासिल थी। चोटों के कारण मेरा नाम राणासाँगा रख दिया गया था।
फिर तुम एस.के.जे.पी.गर्ल्स इंटर कालेज जाने लगी। और हमारी एक साथ स्कूल जाने की मस्ती ख़त्म। अब बड़े भाई की जिम्मेदारी निभाने का समय शुरू और अपने साथ छोटी बहन को स्कूल ले जाने की जिम्मेदारी ने हमारी शैतानियाँ स्कूल में कम कर दीं।
तुम्हारे इंटर करने के बाद पापा का स्थानांतरण शाहजहांपुर हो गया और तुमको महिला डिग्री कालेज लखनऊ हास्टल में भेज दिया। तुम्हारे स्नातक करने के दौरान मेने पहली चिट्ठी लिखी। छुट्टियों में घर आने पर मेरे चिट्ठी का खूब मजाक उड़ाया। फिर क्या उस दिन के बाद से आज तक एक भी चिट्ठी नहीं।
तुम्हारा स्नातक पूरा और मेरा फेल होना। फिर तुम्हारा एम.ए. हिंदी व संस्कृत से करना और शादी। वैसे शादी के बाद तुमको सरिता,मुकता, स्वतंत्र भारत आदि के लिए लिखना बंद नहीं करना चाहिए था। तुम अच्छा लिखती हो।
तुम्हें याद है हमारा दोस्त जो हमारी चिट्ठियों से प्रेरित होकर लिखना शुरू किया था। हमलोग आपस में चिट्ठियां लिखा करते थे। और एक दुसरे के लेखन की तारीफ करते थे। वह आज बहुत अच्छा लेखक है कई पुरस्कार प्राप्त कर चूका है। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल जी ने भी सम्मानित किया था। उन्मुक्त लिखना दोस्तों से पत्राचार से ही शुरू होता है। में तो दिशा ही भटक गया था। तुम जीवन की नए कार्य के साथ नई उचाईयों पर उम्र के इस पड़ाव में अवश्य पहुँचो। यही मेरी कामना है। और हाँ ….इस रक्षा बंधन पर बचपन वाली सबसे बड़ी वाली राखी बंधने जरुर आना जिससे मैं बड़े गर्व से कह सकूँ की मेरी राखी सबसे बड़ी है।