मुंबई छोड़कर व्यवसायिक खेती के मैदान में उतर पड़े अविनाश शर्मा

-देश में मात्र 35% ज़मीन का ही उपयोग व्यवसायिक खेती के लिए, किसान बेहतरी के लिए इसे अपनाएं
अजय शर्मा बाबा/ देवरिया, उप्र

आज मैं आप सभी से अविनाश शर्मा जी की बात करने जा रहा हूं। अविनाश जी ग्राम कौआडील जनपद गोरखपुर उत्तरप्रदेश के रहने वाले हैं आपका गांव पूर्वी उत्तरप्रदेश के स्वजातियों का बेहद प्रतिष्ठित गांव है । अविनाश जी ने बी एस सी कर रखा है और रोजगार के चक्कर में बहुत सारे बड़े शहरों की खाक भी छान चुके हैं फिलहाल मेरी उनसे हाल में ही हुई बातचीत के कुछ अंश तो आइए पढ़ते हैं और जानते हैं कुछ ऐसे ।अविनाश जी ने तमाम जनकारियों के आधार पर व्यवासियक खेती की तैयारी कर ली है। वर्तमान समय में वे लगभग एक एकड़ जमीन में टमाटर की खेती करने जा रहे हैं। वे टमाटर की नर्सरी तैयार कर चुके हैं। भविष्य में यह सतावर की खेती करने के लिए भी तैयारी कर रहे हैं।

अविनाश जी से मेरी बात स्वामीनाथन रिपोर्ट पर भी हुई। क्या 2004 में गठित स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट देश में लागू हो पाएगी? क्या देश के किसान पहली हरित क्रांति के बाद दूसरे कृषि रिफार्म के लिए तैयार हैं?
कोरोना की महामारी चारों तरफ पसरने के बाद पूरे देश की अर्थव्यवस्था पर नये सिरे से विचार करने की आवश्यकता आन पड़ी है। तो कृषि क्षेत्र में कौन-कौन से बदलाव और सुधार हो सकतें हैं जिससे ग्रामीण भारत खासकर किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार लाया जा सकता है? इन सभी बातों में एक और भी महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि हम कृषि योग्य भूमि के कुल 65%भूभाग पर खाद्यान्न कि खेती करते हैं तो मात्र 35% ज़मीन का उपयोग हम व्यवसायिक खेती के लिए करते हैं। इस आंकड़े को जब तक हम बदलेंगे नहीं तब तक किसानों कि आर्थिक स्थिति में बहुत सुधार नही हो सकता।
अब कुछ और आंकड़ों सहित बातों पर विचार करते हैं। आज भी मात्र 45% कृषि योग्य भूमि सिंचित भूमि के रूप में है। वो भी तब जब देश की पहली पांच पंचवर्षीय योजनाओं में सिंचाई पर बहुत अधिक ध्यान दिया गया। बहुत से प्रदेशों में बिजली बिल भी माफ किए गए फिर भी हम अपने संभावित लक्ष्य से बहुत अधिक पीछे ही रह गए।
देश की कुल जनसंख्या के 49% लोग कृषि से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं। भारत की जीडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान 17% का है तो कुल निर्यात में भी 12%की हिस्सेदारी भी इसी क्षेत्र से है। यदि सीधे सीधे बात की जाए तो देश में हर साल तकरीबन तीस अरब डालर की की कुल पुजीं का कारोबार कृषि क्षेत्र से आता है। फिलहाल सरकारें इसे अगले दो सालों में साठ अरब डालर के मानक पर ले जाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
आगे भी भी ब्रह्मभट्टवर्ल्ड के मंच से मेरी कोशिश है कि खेती से अपने को मजबूत कर रहे स्वजातीय परिवारों से आपको परिचय करवाऊँ।
BBW के सदस्यों ने इस लेख पर क्या लिखा:
अविनाश कुमार शर्मा: वैश्विक महामारी के समय पूर्ण रूप से बंदी ने पूरे विश्व को यह खुला संदेश दिया है कि खेती ही एक मात्र विकल्प है हर परिस्तिथियों में अर्थ व्यवस्था को बचाने और बढ़ाने के लिए।आज के युवा आगे आएं और तकनीकी रूप से खेती कार्य को आगे ले जाकर देश की उन्नति में भागीदार बनें।दीपक शर्मा बिल्कुल। नौकरी यदि प्रतिष्ठित है तो ठीक अन्यथा स्वरोजगार या व्यावसायिक खेती से बेहतर कोई विकल्प नहीं है।
Priyanka Roy: कृषि जगत से आपके द्वारा एक और अच्छी जानकारी। अविनाश शर्मा जी को ढेरों बधाई व शुभकामनाएं।

Roy Tapan Bharati: जब फोन पर खेती में अविनाश जी के इस साहसिक कदम की जानकारी मिली तो मन गदगद हो गया। भाई अजय शर्मा बाबा ने फौरन अविनाश जी के खेती-बाड़ी मिशन पर आज सुबह सुबह एक सुंदर लेख भी लिखा डाला। शुभकामनाएं।
Roy Tuhin Kumar: यदि विदेशों की तरह उच्च शिक्षित नागरिक भी भारत में कृषि क्षेत्र में मेहनत करे तो क्रांति आ सकती है।इससे उसे आत्मनिर्भरता के साथ सरकारी रोजगार का मोहताज नहीं होना पडेगा।बशर्तें वह आधुनिक तरीक़े से खेती करे और मांग के मुताबिक उपज करे।इससे वह आर्थिक रूप से जहाँ काफी समृद्ध हो सकता है ,वहीं अन्य लोगों को भी रोजगार मुहैया करा सकता है।
–Tripurari Roy: Roy Tuhin Kumarjee, बिल्कुल सही कहा आपने। अभी भी भारत में विदेशी कंपनियों के बीज, कीटनाशक, खेती से संबंधित उपकरण आदि धड़ल्ले से बेचे जा रहे हैं। इस क्षेत्र में विदेशी निवेश की प्रबल संभावनाऐं हैं।
Sanjeev Ray: ये बढ़िया है, इनके हौसले को बुलंदी देने में हमे कोई कसर नही छोड़नी चाहिए। अग्रिम बधाई।

Santosh Sharma: हॉलैंड और भारत मे खेती से सम्बंधित एक समस्या कमान थी वो है बड़ी मात्रा में छोटी – छोटी कृषि जोत की भूमि । हालैंड के किसानों ने इस समस्या का समाधान निकाला और संगठन बनाकर सामूहिक खेती करने लगे। व्यावसायिक खेती का मजा तभी मिलता है जब खेती का रकबा बड़ा हो। हालैंड के लोग इसका भरपूर लाभ ले रहे हैं। अपने यहां बहुत कम किसान ऐसे हैं जिनके पास अब बड़ा खेती का रकबा हो…
Satish Bhatt Bhardwaj: बहुत ही अच्छा निर्निय है कृषि के काम मे बहुत संभावना है! लोग सरकारी नौकरी के चक्कर मे अपना समय और पैसा दोनो गवा देते है!
Tripurari Roy: अच्छी जानकारी। आज हमारी शिक्षा व्यवस्था नौकरशाहों को जन्म दे रही है। इस परिस्थिति में मूलभूत सुविधा पर हमारा ध्यान नहीं जा रहा। हमें कृषि, शिक्षा और स्वास्थ्य पर ज्यादा करने की आवश्यकता है। किसी भी सरकार को इसी पर ध्यान देना होगा।

Vicky Mishra: महात्मा गाँधी ने कहा था “भारत गांवों में बसता है और कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की आत्मा है।” यह कथन भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए हमेशा प्रासंगिक रहेगा। मेरा व्यक्तिगत रूप से ये मानना है की यदि भारत को सच में आत्मनिर्भर होना है तो उसे सबसे ज़्यादा ध्यान कृषि और कृषि आधारित उद्योगों पर देना होगा, क्योकि बढ़ती आबादी के साथ कृषि योग्य भूमि दिनोंदिन कम होती जा रही है। इसी कारण से अविनाश जी जैसे लोगो का योगदान अति महत्वपूर्ण हो जाता है। आप इसी तरह से कृषि में नवाचार करते रहे, और एक धन्यवाद अजय भईया को भी जो हम सबको अविनाश जी जैसे लोगो से परिचित कराते हैं।