ए मां, तेरी सूरत से भला भगवान की सूरत क्या होगी !

सोशल कमिटमेंट के लिए पापा को कई बार दोस्तों से कर्ज लेना पड़ता था : रंजना राय

कहते हैं औरत घर की लक्ष्मी होती है मेरी मां साक्षात इसका प्रमाण थी। घर में कभी भी किसी तरह की कमी नहीं होती। ना उसके प्यार में कभी कमी आती।हालांकि घर की आर्थिक स्थिति उतनी अच्छी नहीं रहती थी। पापा की इकलौती कमाई थी। दादा जी को भी पापा अपनी कमाई का थोड़ा सा हिस्सा भेजते थे , भाइयों को भी वक्त पड़ने पर सहायता करते थे। कई बार सोशल कमिटमेंट भी आ जाते थे और इसी वजह से पापा को कई बार दोस्तों से कर्ज लेना पड़ता था।
रंजना राय/ बेंगलुरु
जी, हां! जब भी मां का जिक्र चलता है तो हर शब्द छोटा पड़ जाता है। उसकी तुलना सिर्फ और सिर्फ ईश्वर से ही की जा सकती है। देवी की तरह खूबसूरत आंखें , दिव्य चेहरा, शांत स्वभाव, बिजली की तरह सोचने की रफ्तार, मानो अपनी खूबसूरती से अपनी मंजिल को तराश रही हो।

उस देवी का एकमात्र मकसद था कि दिन-रात कड़ी मेहनत कर अपने परिवार की सुविधाओं पर ध्यान देना। मंजिल सिर्फ एक ही था कि पति स्वस्थ रहें, बच्चे आगे बढ़ें। चेहरे पर कोई शिकन नहीं। हर वक्त मुस्कुराते रहना। चाहे कितनी भी तकलीफ हो दिल में।कितनी भी किल्लत हो पैसे की। हमें इसका एहसास कभी होता ही नहीं होता था ।
जब हमलोग छोटे थे तो अक्सर छुट्टियों में नाना-नानी या दादा-दादी के यहां जाया करते और खूब मस्ती करते थे। लेकिन धीरे-धीरे वह भी कम होने लगा और वह शादी-ब्याह तक ही सीमित रह गया। हम चार भाई-बहन थे। एक भाई और 3 बहन। जैसे-जैसे हम बड़े होने लगे, मां-पापा को चारों बच्चों को उच्च शिक्षा देने का सपना और उनकी शादी की चिंता सताने लगी।
कहते हैं औरत घर की लक्ष्मी होती है मेरी मां साक्षात इसका प्रमाण थी। घर में कभी भी किसी तरह की कमी नहीं होती। ना उसके प्यार में कभी कमी आती। हालांकि घर की आर्थिक स्थिति उतनी अच्छी नहीं रहती थी। पापा की इकलौती कमाई थी। दादा जी को भी पापा अपनी कमाई का थोड़ा सा हिस्सा भेजते थे , भाइयों को भी वक्त पड़ने पर सहायता करते थे। कई बार सोशल कमिटमेंट भी आ जाते थे और इसी वजह से पापा को कई बार दोस्तों से कर्ज लेना पड़ता था। लेकिन वह हमें इसका एहसास नहीं होने देते।
दोनों के दिलों में एक ही सपना था की बच्चों को ऐसा बना दो जिससे उन्हें अपनी जिंदगी में किसी चीज की कमी ना हो और वह अपने पैरों पर खड़े रहें। उनके अच्छे कर्म और ईश्वर की कृपा से आज उनके सभी बच्चे सुखी हैं। वैसे तो हम जिस समाज से आते हैं और जिस मिडिल क्लास फैमिली को रिप्रेजेंट करते हैं वहां पुत्र की अहमियत। बहुत ज्यादा है मेरी मां को भी पुत्र से बेहद लगाओ था लेकिन मैे गर्व के साथ यह कह सकती हूं कि मेरे माता-पिता पुत्र और पुत्री के बीच किसी तरह का भेदभाव नहीं किया।

मेरी मां मिथिला की बेटी थी पूजा पाठ बहुत करती थी खाने-पीने का उसे कोई ध्यान नहीं रहता था। कभी इस मंदिर तो कभी उस मंदिर माथा टेकते रहती थी। दुनिया भर का उपवास करना, निर्जल। व्रत करना उसकी आदत सी बन गई थी … धीरे-धीरे शरीर कमजोर होने लगा और वह अक्सर बीमार पड़ने लगी। सबका ख्याल रखते-रखते वह कमजोर हो गई थी लेकिन अपने बच्चों को सुखी देखकर उसके जीवन बहुत खुशी से बीतने लगा था। जब सुख भोगने का समय आया तो हमें ही छोड़कर इस दुनिया से चली गई। 10 दिसंबर 2011 को बेंगलुरु में इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई।
हाल ही में मैं अपने पिता और बड़ी बहन के साथ अपनी नानी के गांव अपने ममेरे भाई की बेटी की शादी अटेंड करने गई। हालांकि मेरे चाहने वाले इस बात से बहुत परेशान थे कि मैं वहां कैसे रह पाऊंगी? लेकिन मैं वहां गई …वहा के लोगों से मिली। सबकी जुबान पर मां की अच्छी और खूबसूरत यादें थी। यह देखकर और सुनकर बहुत अच्छा लगा।
दरअसल शादी तो एक बहाना था मैं तो उस धरती को और उस गांव को सलाम करने गई थी जहां मेरी मां रहती थी। (लेखिका रंजना राय, जो बेंगलुरु में बसी हैं, agriplast Tech India Pvt. Ltd की डायरेक्टर हैं)