You are here
बौध्द बिहारो के नाम पर ही हमारे प्रान्त का नामकरण हुआ Bihar India 

बौध्द बिहारो के नाम पर ही हमारे प्रान्त का नामकरण हुआ

चलो पटना मंथन 2016 (18-12-2016
**********************************

Mahavir Prasad Bhatt
mahaveerम पटना मंथन मे आने वाले मित्रों का हार्दिक अभिनन्दन करते हैं।
मित्रो हमने पिछले पोस्ट मे आप को राजगीर के ऐतिहासिक पहलुओ से रूबरू कराया था। आज आपको राजगीर से जुडे एक अन्य महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल नालंदा के बारे मे कुछ जानकारी लेकर आया हु।
आये हम नालंदा विश्व विद्यालय के बारे मे कुछ जाने जिसके विस्तृत बौध्द बिहारो के नाम पर ही हमारे प्रान्त का नामकरण हुआ है। 1
यह प्राचीन भारत में उच्च शिक्षा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण और विख्यात केन्द्र था। महायान बौद्ध धर्म के इस शिक्षा-केन्द्र में हीनयान बौद्ध-धर्म के साथ ही अन्य धर्मों के तथा अनेक देशों के छात्र पढ़ते थे। वर्तमान बिहार राज्य में पटना से ८८.५ किलोमीटर दक्षिण-पूर्व और राजगीर से 11.5किलोमीटर उत्तर में एक गाँव के पास अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा खोजे गए इस महान बौद्ध विश्वविद्यालय के भग्नावशेष इसके प्राचीन वैभव का बहुत कुछ अंदाज़ करा देते हैं। अनेक पुराभिलेखों और सातवीं शताब्दी में भारत भ्रमण के लिए आये चीनी यात्री ह्वेनसांग तथा इत्सिंग के यात्रा विवरणों से इस विश्वविद्यालय के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है। यहाँ १०,००० छात्रों को पढ़ाने के लिए २,००० शिक्षक थे। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने 7 वीं शताब्दी में यहाँ जीवन का महत्त्वपूर्ण एक वर्ष एक विद्यार्थी और एक शिक्षक के रूप में ग किया था। प्रसिद्ध ‘बौद्ध सारिपुत्र’ का जन्म यहीं पर हुआ था।
स्थापना व संरक्षण
इस विश्वविद्यालय की स्थापना का श्रेय गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम 450-470 को प्राप्त है। इस विश्वविद्यालय को कुमार गुप्त के उत्तराधिकारियों का पूरा सहयोग मिला। गुप्तवंश के पतन के बाद भी आने वाले सभी शासक वंशों ने इसकी समृद्धि में अपना योगदान जारी रखा। इसे महान सम्राट हर्षवर्द्धन और पाल शासकों का भी संरक्षण मिला। स्थानीय शासकों तथा भारत के विभिन्न क्षेत्रों के साथ ही इसे अनेक विदेशी शासकों से भी अनुदान मिला।
अंतरराष्ट्रीय नालंदा विश्वविद्यालय में 821 साल बाद 1 सितम्बर से फिर से पढ़ाई शुरू हो गई। राजगीर की पहाड़ियों, गरम कुंड के झरनों और पांडव पोखर के ठीक बगल में बना भव्य कॉन्वेंशनल हॉल इस ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बना.
नालंदा विश्वविद्यालय भारत का सर्वप्रथम विश्वविद्यालय माना जाता है, जिसे 1193 में विदेशी आक्रमणकारियों ने जला दिया था। विश्वविद्यालय के अवशेष खंडहर के रूप में आज भी मौजूद हैं। ऐतिहासिक महत्त्व के खंडहरों से छेड़छाड़ किए बिना वहां से 12 किलोमीटर दूर राजगीर में नए विश्वविद्यालय का निर्माण किया जा रहा है।
विश्वविद्यालय में दो विषयों इतिहास और पर्यावरण विज्ञान की पढ़ाई शुरू हुई है। भविष्य में यहां 5 और विषयों की पढ़ाई होगी। इनमें इतिहास व पर्यावरण विज्ञान के अलावा बुद्धिस्ट स्टडीज, फिलॉसॉफी एंड कॉम्प्रेटिव रेलिजंस, लिंग्विस्टिक्स एंड लिटरेचर, इंटरनेशनल रिलेशन एंड पीस स्टडीज और इंफॉर्मेशन साइंस एंड टेक्नोलॉजी विषयों की पढ़ाई होनी है। इन सात विषयों का पाठ्यक्रम इस प्रकार तैयार किया गया है कि पुराने विषयों की सामग्री शामिल हों। इसकी उपयोगिता बढाने के लिए इसमें आधुनिक परिवेश को भी शामिल किया गया है।
फिलहाल यहां 15 छात्रों ने दाखिला लिया है, जिनमें जापान और भूटान का भी एक-एक छात्र शामिल है। नए विश्वविद्यालय में 8 शिक्षकों की नियुक्ति की गई है। नालंदा विश्वविद्यालय के उपकुलपति डॉक्टर गोपा सबरवाल के अनुसार, यहां पढ़ाई से ज्यादा शोध पर जोर दिया जाएगा।
दाखिले के लिए 35 देशों से कुल 1400 आवेदन मिले थे. लेकिन विश्वविद्यालय ने चयन का जो मानक तैयार किया है, उसके अनुसार ही दाखिले किए गए. चयनित विद्यार्थियों में चार लड़कियां हैं. जिन छात्र-छात्राओं का चयन किया गया है, वे अपने विषयों में असाधारण प्रतिभा रखते हैं. इनका चुनाव कठोर मानक के आधार पर किया गया है.
विश्वविद्यालय का भवन प्राचीन भवन की तरह स्थापत्य कला का एक नमूना होगा। नए भवनों की दीवारें काफी मोटी होंगी और इनकी संरचना ऐसी होगी कि एयर कंडीशन की जरूरत नहीं पड़ेगी। पूरा कैंपस प्रदूषणमुक्त होगा। जीरो पावर यूज के सिद्धांत पर आधारित भवन बनाए जा रहे हैं अर्थात यहां बिजली का उपयोग नहीं होगा। यह पूरी तरह इको फ्रेंडली होगा। कैम्पस के बीच में विशालकाय लाइब्रेरी होगी और इसके चारों ओर सातों विषयों के स्कूल होंगे, ताकि सभी विषयों के छात्र सीधे पुस्तकालय से जुड़े रहें।
प्राचीन काल में भी महाविहार के बीचोंबीच रत्नोदधि, रत्नसागर व रत्नरजक नामक तीन पुस्तकालय थे। उल्लेखनीय है कि पुराने नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना पांचवीं शताब्दी में गुप्त शासन के दौरान हुई थी और इस पर तीन बार आक्रमण हुए थे. तीसरा हमला बख्तियार खिजली ने 1193 में किया था. प्राचीन विश्वविद्यालय के भग्नावशेषों की खोज इतिहासकार अलेक्जेंडर कनिंघम ने की थी.

Related posts

Leave a Comment