You are here
शर्मा : क्या आप पुरखों के निर्णयों को बदलेंगे? Chattisgarh India 

शर्मा : क्या आप पुरखों के निर्णयों को बदलेंगे?

शर्मा ब्राह्मण, ब्रह्मभट्ट अब्राह्मण

प्रमोद ब्रह्मभट्ट/रायपुर

वास्तव में लोग उतना ही जानते हैं जितना उनके बड़े बुजुर्ग बताते हैं। ओडीशा में ब्राह्मणों का एक उपनाम साहु भी होता है दक्षिण के ब्राह्मण कल्लूरी और राव भी लिखते हैं लेकिन इन कूपमंडूप वेदपाठियों को कौन समझाए कि दुनिया उतनी ही बड़ी नहीं है जितनी तुम देखते हो।

P Brahmbhatt
प्रमोद ब्रह्मभट्ट, रायपुर

सामान्यतया लोग शर्मा और वेदपाठियों का आष्पद लगाने वालों को ब्राह्मण समझते हैं और दीगर उपनाम लगाने वालों को अब्राह्मण समझते हैं। इसका उदाहरण पिछले दिनों फेसबुक पर हिन्दू ब्राह्मण समाज में एप्लाई करने पर मिला।(https://www.facebook.com/groups/hindubramhansamaj/ ) मेरे लिए ये कोई नहीं बात नहीं है। जबकि मेरे रिश्तेदार जो शर्मा लिखते हैं वे इस सीक्रेट ग्रुप के सदस्य हैं और उन्हीं को देख कर मैंने भी भावातिरेक में एप्लाई कर दिया था । बाद में देखने पर पता चला कि इसके एडमिन पास शहर के हैं लेकिन अब उनसे कौन बहस करे। किसे अपने ग्रुप में रखना है और किसे अपनी फ्रेंड लिस्ट में शामिल करना है यह उस एडमिन या व्यक्ति के स्वविवेक पर निर्भर करता है।

वास्तव में लोग उतना ही जानते हैं जितना उनके घर के बड़े बुजुर्ग उन्हें बताते हैं। ओडीशा में ब्राह्मणों का एक उपनाम साहु भी होता है दक्षिण के ब्राह्मण कल्लूरी और राव भी लिखते हैं लेकिन इन कूपमंडूप वेदपाठियों को कौन समझाए कि दुनिया उतनी ही बड़ी नहीं है जितनी तुम देखते हो परंतु जब बात ब्राह्मण एकता की हो, मुंडी गिनाने की हो तो सब चलता है। आखिर अल्प संख्यकों को अपना वजूद जो बताना होता है।

आभाषी दुनिया भी गजब की चीज है। यहां फेक आईडी बनाकर आप कहीं भी घुस करते हैं और दूसरे आपके बारे में क्या जहर उगलते हैं इसका पता लगाया जा सकता है। हालांकि यह अनैतिक होगा फिर भी अगर जंग हो तो फिर सब जायज है। मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं है मैं स्वयं की स्थिति के लिए किसी दूसरे के सर्टीफिकेट का आश्रित नहीं हूं। वैसे एक बात और बता दूं कि छत्तीसगढ़ में उत्तर प्रदेश के बढई और श्रीवास भी शर्मा लिखते हैं। इस मंच में पता थोड़ी चलेगा अगर वे एप्लाई करें तो उन्हें भी जोड़ लिया जाएगा। खैर मुझे कोई आपत्ति नहीं है ।

यह बताने का मेरा मतलब कुछ और है। आजकल अपने आरक्षण समर्थक मंच पर एक जाति एक सरनेम की बात चल रही है पिछले जींद हरियाणा सम्मेलन में इसकी जोरदार वकालत भी हुई। वास्तव में जो परिवार ब्रह्मभट्ट,भट्ट,राय,राँय या अन्य उपनाम लिखते हैं उन्हें इस स्थिति से हमेशा दो चार होना पड़ता है। लेकिन जो लोग शर्मा या अन्य वेदपाठियों का नाम लिखते हैं कम से कम विवाह के अवसरों को छोड़कर ब्राह्मण ही माने जाते होंगे ऐसा मुझे लगता है और तदानुसार सम्मान भी पाते होंगे।

मंच पर यह भी साफ हो चुका है कि उन्नीसवी शताब्दी के पूर्वाध में एक सम्मेलन में सामूहिक निर्णय के तहत शर्मा या अन्य ब्राह्मणों का उपनाम रखने का निर्णय लिया गया था जो आज तक चला आ रहा है। तो क्या आज आप लोग अपने पुरखों के निर्णयों को बदलेंगे। वैसे मैं यहां एक और उदाहरण देना चाहता हूं कि एक और मिश्र जाति श्रीवास्तव (कायस्थ) अलग-अलग उपनाम लिखती है लेकिन पिछले मात्र सौ वर्षों में उन्होंने इन्हीं कई उपनामों के साथ चित्रगुप्त पूजा में शामिल होते हुए एकता बनाई और समाज में गर्व करने लायक स्थान प्राप्त किया है। क्या अपने यहां भी ऐसा नहीं हो सकता अब तो हमारे हाथ में आभाषी दुनिया का कारगर हथियार भी है। अब समाज में एकता की बात भी बलवती हो रही है। इससे युवाओं के आरक्षण प्राप्ति के अभियान में क्या अड़चन आएगी। मेरा मंच विचार करे। सादर…

Related posts

Leave a Comment