14 का प्रेम दिवस अपना या पराया?
वेलेनटाइन डे’ मतलब प्यार के इजहार का दिन, जो 14फ़रवरी सन् 269 में रोम के सेंट वेलेनटाइन की शहादत के उपरांत प्रेम दिवस के रूप में शुरू हुआ और रंगीन टीवी चैनलो के प्रादुर्भाव ने इससे जुड़े ग्रीटिंग्स व कार्ड्स की संस्कृति को भारत में भी फैला दिया और आज “14फ़रवरी वेलेंटाइन डे”सार्वजनिक स्थानों पर युवाओं के खुले प्रेम प्रदर्शन की प्रतिस्पर्धा का मुख्य आधार बन गया !
आलोक शर्मा/महाराजगंज

वर्षभर अनेक दिवस और त्योहारों का आयोजन करने वाला परम्पराओं का देश भारत आदि से प्रेम का पुजारी रहा हैं,प्रेम के महत्व,गरिमा,पवित्रता व समर्पण की ठीक-ठीक व्याख्या करने वाले भारत के अनंत प्यार के किस्से पूरी दुनिया के समक्ष एक अनोखे इश्क,प्यार और मुहब्बत की मिशाल पेश करते हैं!एक तरफ जहाँ महाकवि कालिदास से जायसी तक के कवियों ने प्रेम के विभिन्न अवस्थाओं का वर्णन कर इसके महत्व का श्रृंगार किया तो दूसरी तरफ ऋषि वात्सायन ने विश्व प्रसिद्ध ग्रन्थ कामसूत्र की रचना कर पूरी दुनिया को आकर्षित कर डाला!लेकिन दुःख इस बात का है कि प्रेम के सबसे बड़े पण्डित भगवान कृष्ण के देश में कामदेव के भस्म होने के बाद प्रेम की पूजा का प्रचलन ही समाप्त हो गया और 365 दिन पूरे संसार को प्यार की सीख़ देने वाला दुष्यंत और शकुंतला का देश भारत पाश्चात्य विचारों की उपज वेलेंटाइन डे पर आज आश्रित हो गया !’
वेलेनटाइन डे’ मतलब प्यार के इजहार का दिन, जो 14फ़रवरी सन् 269 में रोम के सेंट वेलेनटाइन की शहादत के उपरांत प्रेम दिवस के रूप में शुरू हुआ और रंगीन टीवी चैनलो के प्रादुर्भाव ने इससे जुड़े ग्रीटिंग्स व कार्ड्स की संस्कृति को भारत में भी फैला दिया,धीरे-धीरे विश्व बाजार की प्रतिस्पर्धा,आर्थिक उदारीकरण की नीति तथा पाश्चात्य साम्राज्यवादी ताकतों के प्रभाव ने इस आग में घी डालने का काम किया,परिणाम स्वरूप् हमारे परम्परागत प्यार का रूप आधुनिकता के चकाचौंध में गुम होता गया और आज “14फ़रवरी वेलेंटाइन डे”सार्वजनिक स्थानों पर युवाओं के खुले प्रेम प्रदर्शन की प्रतिस्पर्धा का मुख्य आधार बन गया!अमेरिका के ग्रीटिंग कार्ड एसोसिएशन का अनुमान है कि लगभग एक अरब वेलेंटाइन हर साल पूरी दुनिया में भेजे जाते हैं,जो आज कार्ड प्रेषित करने वाला संसार का सबसे बड़ा दिवस बन चुका है!
प्रेम एक ख़ुशी,अहसास,भाव व समर्पण है जो किसी विशेष चाहत के लिए एक स्वतंत्र पथिक की भांति,बिना घुंघरू वाले पाओं से उस मंजिल की तरफ चलायमान होता है जिसे पथिक के आने की सूचना पूर्व से ही रहती है,फिर भी कल्पनाओं से उपजे प्रेम के इस यात्रा को न तो मंजिल के पास रोकने की ताकत होती है,न राही के पास रुकने की हिम्मत!ऐसे में मुझे नहीं लगता कि प्रेम की पूर्णता हेतु पाश्चात्य सभ्यता के वेलेनटाइन डे या इसके तरीकों को भारतीय प्रेम का आधार बनाया जाना चाहिए!हाँ इसकी बढ़ती लोकप्रियता ने यह स्पष्ट कर दिया की प्रतिबन्धों की जगह अपनी परम्पराओं के अनुसार इसे कोई और रूप देने की जरूरत है,ताकि पवित्र प्रेम के साथ हमारे सभ्यता,संस्कार व परम्परा भी आधुनिकता की आँधी में जीवन्त रह सके!