बूढे आहत हैं…
बूढे आहत हैं…
बूढे नाराज हैं अपने बूढेपन से,
बालों के पक जाने से,
दाँतों के खिसक जाने से,
आँखों के धूधलेपन से,
वे आहत है अपने सूनेपन से .
झर्रीदार आँखों की गहराई में,
डूबते सपनों की तनहाई में,
उन्हें तलाश रहती है,
कोई पूकारे अपनेपन से,
वे आहत है अपने सूनेपन से .
जिन उँगलियों ने चलना सिखाया,
उन कन्धों पर बैठ जिसे दूनियां दिखाया,
आज थके है कन्धे, काँपती है उँगलियां,
उखडती साँसे, उम्र की करती है चुगलियां,
खामोश है वे रिश्तों के इस धोखेपन से,
वे आहत है अपने सूनेपन से .
बूढों को याद है अपना बचपन,
रंग बिरंगी तितलियां, राजा रानी की कहानियाँ,
उम्र के इस पडाव में,
बचपन कब बीत गया,
पर धीरे2 चलता कछुआ,
खरगोश से जीत गया,
उबरना चाहते है वे अपने बचपन से,
वे आहत है अपने सूनेपन से .
उन्हें पता है परछाँईया,
हकीकत नही हुआ करती,
पत्थरों से बने हाथ दुआयें नही देती,
सपनो का कोई बजूद नही होता,
बीता कल कभी साथ नही होता,
आश्चर्य है उन्हें अपनों के सौतेलेपन से,
वे आहत है अपने सूनेपन से .
बूढे अपनी पहचान खोना नही चाहते,
वे आम से खास होना नही चाहते,
उन्हें फिक्र है कोई उन्हें पुकारती है,
तोतली जुवान से,
उन्हें दादू2कहकर पास बुलाती है,
वे आजाद नहीं हो पाते,
रिश्तों के इस खोखलेपन से,
वे आहत है अपने सूनेपन से .
उनके सपनों के पीछे,
तुम भाग नहीं पाओगे,
बस उन्हें उनका आकाश दे दो,
अपने हिस्से की थोडी संवेदनाएं,
और थोडा प्यार उन्हें दे दो……..
(स्वरचित)