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जीवन की खुशियों में केवल धन? नहीं-नहीं ! India Uttar Pradesh 

जीवन की खुशियों में केवल धन? नहीं-नहीं !

प्रेम की पूर्णता तो इसमें है कि एक दिन चौक की चापलूसी छोड़कर समय से 1 घण्टा पहले घर पहुँचते ही दरवाजे पर खड़ी माँ की आखों ने झांकते हुए हाथ पकड़कर यह कहना कि माँ तुम्हारी आँखे लाल और शरीर गरम, क्या बात है बहू के साथ चाय नहीं हुयी क्या?

आलोक शर्मा, महाराजगंज (यूपी)

Alok Sharma1प्रसन्नता यदि इंसान का गुण है तो खुशियाँ आँगन का श्रृंगार! जो धन से नहीं बल्कि अच्छे विचारों से समृद्ध होतीं हैं! धन के अभाव को ही पारिवारिक कलह या आपसी दुराव का प्रतीक मानना जीवन की सबसे बड़ी भूल है!जो जिंदगी के हर्ष, उल्लास और ख़ुशी को घूंन की तरह चबा जाती है!

खुशियाँ कोई बस्तु नहीं जिन्हें बाजार से खरीद लिया जाय,बल्कि वह नियामत हैं जिन्हें अपनों के साथ अच्छे विचारों से उतपन्न करने के लिये घर-आँगन में माँ-बाप भाई-बहन तथा बीबी और बच्चों का सहयोग लेना आवश्यक होता है! हरपल आनंद की अनुभूति को पसन्द करने वाला इंसान या तो खुश रहने का तरीका नहीं जनता या इन तरीको से अलग जिंदगी में खुशियाँ ढूढ़ता है!

“प्रेम की परिणति विवाह में है लेकिन आज का युवा वर्ग विवाह से बाहर प्रेम ढूढ़ रहा है”! जरा सोचिये कि पत्नी के हाथ का मालपुआ छोड़कर पड़ोसन की चटनी का तारीफ करने वाला पति या अपने पति को हरपल आँख दिखाकर दूसरे के सम्मुख मुस्कुराने वाली पत्नी, माँ को बृद्धाआश्रम पहुंचाकर सास की थाली सजाने वाले दामाद या सास को प्रताड़ित करने के तरीके अपनी माँ से पूछने वाली बहू के साथ ही अपने बच्चों को डाँटकर मित्रों की औलाद को गोद में उठाने वाला बाप और अपने बाप का तिरस्कार कर समाज को पितृ सेवा की सीख देने वाला बेटा, भाई के कहने पर मुंह सिकोड़ने तथा अपनी सहेलियों के लिए पकवान बनाने वाली बहन,या केवल बहन की सहेलियों को ही उपहार देने वाला भाई!इनके जीवन में स्थाई खुशियों की कल्पना कैसे की जा सकती क्यों कि इन कृत्यों में स्थाई प्यार नहीं बल्कि क्षणिक आनंद है!जिसकी निरन्तरता पारिवारिक कलह व आपसी मनभेद को जन्म देती है!

प्रेम की पूर्णता तो इसमें है कि एक दिन चौक की चापलूसी छोड़कर समय से 1 घण्टा पहले घर पहुँचते ही दरवाजे पर खड़ी माँ की आखों ने झांकते हुए हाथ पकड़कर यह कहना कि माँ तुम्हारी आँखे लाल और शरीर गरम, क्या बात है बहू के साथ चाय नहीं हुयी क्या? घर में घुसते ही बीबी से ये कहना कि जोरों की तुम्हारी याद ने हमे जल्दी घर आने पर मजबूर कर दिया क्या बात है मैडम आप ठीक है ना?मुस्कुराती बिटिया को देखते ही यह कहना कि आज मेरी परी जल्दी आने पर अपने पापा को क्या खिलायेगी?तथा पास खड़े बेटे से यह पूछना कि दादाजी के साथ क्या गुफ्तगूं हो रही थी हीरो!ये वो शब्द व स्नेह हैं जो बिना धन व समय खर्च किये ही एक इंसान को रिश्तों का दीवाना बना देते है!

अपने जीवन में मुझे एक तरफ जहाँ माँ का वह तरीका याद है जब वह मिठाइयां सभी भाइयों को चुपके से यह कहते हुए देती थी कि खा लो, भइया को न बताना व बाप का मुझसे यह पूछना कि शाम को आप मेरे लिए भोजन क्या बनवा रहे है सर!गौरवान्वित करता है!तो दूसरी तरफ पहली बार मायके जाते समय पत्नी का मुझे रुमाल देते हुए रुंधे हुए गले से यह कहना कि संभाल के रखियेगा खो जाता है! और चार साल पहले छोटी बिटिया का यह कहना कि पापा ड्यूटी न जाया करें आप थक जाते है!मेरे रिश्तों में अथाह प्यार का सूचक है!हम शायद छोटी-छोटी बातों को ध्यान न देकर जीवन के खूबसूरत पल को व्यतीत करने से महरूम हो जाते है और अच्छे रिश्ते भी अपनों से अलग अन्य लोगों में अपनापन खोजने लगते है! कारण? धन नहीं हमारी सोच है!

Comments on Brahmbhattworls members : 

Amit Sharma : बहुत ही शानदार लिखा आपने हर रिश्ते की अहमियत पर……. बधाई
 
हरिओम प्रासाद राय भट्ट वाह, आप सचमुच में कलम के सिपाही है, बहुत अच्छे तरीके से सारे तथ्यों का समावेश किया है, लोगों में अच्छा मेसेज जाएगा, लोगों लाभान्वित भी होंगे यदी अपने जिंदगी में जिम्मेदारी से लिखे गए तथ्यों को समावेश करेंगे तो?
 
Alok Sharma: सादर आभार, हरिओम प्रासाद राय भट्ट जी!रिश्तो की नाजुक डोर अपनत्व तथा भावनाओं से ही मजबूत होती है!और मजबूत रिश्ते प्रायः ख़ुशी के कारण! सुंदर शब्दों से बल प्रदान करने हेतु पुनःधन्यवाद सर!
 
Deorath Kumar: शानदार जानदार जबरदस्त
 
Alok Sharma: आप पर यह लागू होगा कि नहीं? बता नहीं सकता!हाहाहा…सादर आभार प्रियवर विंदुदेव जी!
 
Kiran Singh: आपने इस पोस्ट में रिश्ते की खूबसूरती की माला मे प्रेमरूपी शब्दो के जो फूल पिरोये हैं वो अनूठा अनुपम और अनुकरणीय है सरजी
 
Sangita Roy: वाह! क्या सुंदर और सार्थक प्रस्तुति !आपका यह संदेश हर जन और हर मन तक पहुँचे यही शुभकामना है।लोग भौतिकवादी होने की जगह परिवारिक सुख का आनंद उठाये तो समाज की रूप रेखा ही समृद्ध हो जायेगी।अतिउत्तम विचारधारा।
 
Anjana Sharma अच्छे ब्यक्तित्व के साथ सुन्दर लेख
 
Pushp Kumar Maharaj आपकी लेखनी की कुशलता को मेरा नमन..हार्दिक बधाई ………खुशियाँ लोगों ने स्वयं पिंजरें में कैद कर रक्खा है .उसे मुक्त करना होगा..
 
Birendra Tiwari आलोक जी आप के लेख में सचाई की भरपुर झलक है।
 
Alok Sharma धन्यवाद सर!हार्दिक आभार!
 
Manan Goswami: क्या बात है सर बहुत ही सुन्दर लेख आज के युवा पीढ़ी में हो रहे भटकाव को समर्पित आप का लेख।
 
Roy Archana: खुशी दिल से जुडा होता है और एहसास का नाम है खुशी !!
सुंदर वर्णन बधाई आपको !!
 
Rakesh Sharma: आलोक भाई, अगर दुनिया जिवन जिने की कला सीख लें तो जिवन सफल हो जायेगा।आपके द्वारा जिवन के बहुमुल्य तथ्यों को जिसतरह शब्दों में पिरोया है वह वास्तव में काफी सारगर्भीत है। खुशिया यानी वास्तविक सुख क्या है इन छोटी छोटी बातों में सन्निहीत है।
 
आलोक भाई दुख तो तब होता है जब प्राय: देखते हैं कि उच्च शिक्षित लोग जिन्हें अध्यात्मिक ज्ञान होते हुए भी अपने को भौतिक दुनिया से अलग नहीं हो पाते तथा दुसरे पर अपना छाप छोड़ने का प्रयत्न करते दिखते हैं।छोडिये इन सब बातों को और सब क्या हाल है।मैं आपसे मिलना चाहता हूं कहां भेट होगी।
 
Anil Sharma रिस्ते नाते सब तार तार ।अंधे दौलत में बेसुमार ।बहुत सुंदर लेख।बधाईयाँ आलोक जी
Sarita Sharma: हमेशा की तरह एक और गंभीर लेख… कभी कभार हास्य-व्यंग्य पर भी कुछ लिख दिया करें लेखक महोदय जी!वैसे बहुत हीं जबदस्त लेख लिखा है आपने शुभकामनाएँ!!
 
Vinita Sharma: आलोक जी इस मन को छू लेने वाली प्रस्तुति के लिये बधाई। वाकई में खुशी परिवार में ही मिलती है। खुशी की परिभाषा अनेक है। ये बाजार में नहीं बिकती । जिंदगी जीवंतता का नाम है । छोटी छोटी बातों पर अमल कर हम खुश रह सकतें है। इतने सटीक शब्दों में लिखकर आपने खुशी की परिभाषा को सार्थक कर दिया
 
Manan Goswami: एक बात बताना भूल गए बॉस जितनी बेहतरीन तरीका से मुझे आपने वेलेंटाइन डे के पूर्व संध्या पे बधाई दी है आज फ़ोन पे आपने मैं अभी तक हँस रहा हु सर।😊😊😊जैसे लिखते है वैसे बाते भी है आपकी जनाव।
 
Urmila Bhatt: जिंदगी को जीने का एक अलग नजरिया बहुत सुन्दर लेख। वास्तविकता यही है कि खुशियाँ अपनों के बीच ही मिलती है।
छोटी छोटी बातों पर ध्यान देकर हम खूबसूरत पल अपनो संग बिताएँ इसी का नाम जिंदगी हैं।

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