तब मैं साइकिल से प्रतापगढ़ के कॉलेज में जाती थी : गीता भट्ट
लेखिका गीता भट्ट, Allahabad
395 रुपये में खरीदी उस साइकिल की रसीद आज भी मेरे पास सुरक्षित : गीता
मैंने पिताजी के सामने साइकिल खरीदने का प्रस्ताव रखा जिसे उन्होंने तुरत रजामंदी दे दी। पिताजी ने मेरे लिए एवन कंपनी की साइकिल इलाहाबाद में अमर साइकिल से 1983 में 395 रुपये में खरीदी थी। उस साइकिल की रसीद आज भी मेरे पास सुरक्षित है।
गीता भट्ट /इलाहाबाद
यह बात 1983-85 की है। यानी आज से 32 साल पहले। तब लड़कियां छोटे शहर या गांव में साइकिल चलाती हुई नहीं दिखती थीं। मेरा ग्रेजुएशन में प्रतापगढ़ शहर के मुनीश्वर दत्त पीजी कॉलेज में दाखिला हुआ था।
रसरामपुर गांव के इसी घर से मैं इस साइकिल से प्रतापगढ़ के कॉलेज में पढ़ने जाती थी : गीता भट्ट
मेरे परसरामपुर गांव से कॉलेज की दूरी करीब 2 किलोमीटर थी जिसे पैदल तय करना मुश्किल भरा काम था। मैंने पिताजी के सामने साइकिल खरीदने का प्रस्ताव रखा जिसे उन्होंने तुरत रजामंदी दे दी। पिताजी ने मेरे लिए एवन कंपनी की साइकिल इलाहाबाद में अमर साइकिल से 1983 में 395 रुपये में खरीदी थी। उस साइकिल की रसीद आज भी मेरे पास सुरक्षित है।
सरकारी कंपनी में अफसर पापा बड़े दिल के इंसान थे। मेरे पिता ने केवल मुझे ही नहीं मेरे तीन और बहनों- आशा (बड़ी बहन), रेखा राय (संझली बहन) और रेणु (छोटी बहन) को भी उच्च शिक्षा के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने मुझे साइकिल देते समय यह नहीं सोचा कि गांव या बाहर के लोग क्या सोचेंगे? वो तो इतने अच्छे इंसान कि अपनी बहुओं को बेटियों की तरह रखते थे। इस साल की शुरुआत में पिताजी परलोक सिधार गए। आज सोचती हूं कि पिताजी कितनी महान शख्सियत थे।
सन 1983 में इलाहाबाद से मेरे नाम से जो साइकिल खरीदी गई उसकी रसीद: गीता भट्ट
मैं अब नानी और दादी दोनों हूं और बहुत घरों को देखा-समझा। मैं गर्व से कह सकती हूं कि मेरे पिता लीक से हटकर उस जमाने में एक बेहतरीन पिता थे। मुझे मेरे पापा पे नाज है। उस समय मेरे पास हाथ की घड़ी। दीवार की घड़ी, टेबल घड़ी। अच्छे-अच्छे कपड़े और पर्याप्त मात्रा मे पैसे भी हुआ करते थे। सब कुछ था।
मुझे याद है। वो मुझसे मिलने जल्दी-जल्दी इलाहाबाद से गांव आया करते थे। मेरी शादी भी मेरी दीदी के सगे देवर से करवाई। पापाजी जानते थे कि मेरी पसंद का युवक कौन है? शादी के बाद मैं भी इलाहाबाद में अपने पति के साथ रहने लगी। मेरे पापा ने मेरा हर कदम पर साथ दिया। वैसे तो वे सभी संतान को चाहते थे पर मुझसे उनका लगाव कुछ ज्यादा ही था। वे अक्सर मेरे घर आना पसंद भी करते थे। अंतिम सांस भी पापा ने मेरे घर पर मेरी आंखों के सामने ही लिया।
मैं अपने मां-पिता और बहनों के साथ इस तस्वीर में।
मैेने इलाहाबाद के अपने मकान में गीता बुटिक खोला तो पापा मेरे इस काम से बहुत खुश हुए। वे महिलाओं को आर्थिक रुप से मजबूत देखना चाहते थे। मेरे पति महेंद्र प्रताप भट्ट पहले बिजनेस करते थे पर किसी कारणवश बाद में उन्होंने बिजनेस छोड़कर नौकरी में आ गए। उनके बड़े भाई और मेरे बड़े जीजा हरेंद्र प्रताप भट्ट से आप सब अवगत हैं ही।
पिता जी के आशीर्वाद से मैंने इलाहाबाद के अपने मकान में बुटिक खोला
बेटी-पिता का सम्बंध समुद्र से भी गहरा होता है। यह रिश्ता आसमान से भी ऊंचा होता है। सूर्य के प्रकाश जैसा साफ होता है। अन्धेरे में भी रोशन रहता है। शायद इसी मनस्थिति की कायल दुनिया है। तभी तो सारा समाज, कोर्ट भी पिता की की संपत्ति में भी बेटियों के हक की बात करता है। अपने ब्रह्मभट्टवर्ल्ड के संस्थापक राय तपन भारती जी की बातें मुझे अच्छी लगती हैं कि बेटियों को भी पिता की अर्जित संपत्ति में हिस्सा मिलना चाहिए। पर यह काम बिरले इंसान ही कर सकते हैं।