मेरे दादा रामबृक्ष महाराजजी हिंदी-मगही भाषा के कवि थे
मेरे दादाजी न केवल अच्छे कवि, आशु-कवि थे बल्कि काफ़ी अच्छे चित्रकार भी थे उनकी कविताओं की कई किताबें भी प्रकाशित हुई…मगही माधुरी, मगही काव्य-संग्रह, (दीप-ज्योति), जो मेरे पापा Arun Sajjan जी ने दादाजी को उनकी पहली पुण्यतिथि पर समर्पित किया था…आज भी बहुत सारी उनकी रचनाओं की पांडुलिपि प्रकाशित होने के लिए रखी हुई हैं।
अर्चना राय/गाजियाबाद

आज दिनांक 28 फरवरी मेरे दादाजी स्वर्गीय रामबृक्ष महाराज की छठी पुण्यतिथि है..जो एक कर्मठ और प्रेरक इंसान ही नहीं बल्कि बहुत अच्छे और समर्पित प्रधानाध्यापक, शिक्षा परियोजना पदाधिकारी, हिंदी और मगही भाषा के अच्छे जानकार और कवि भी थे हिंदी और संस्कृत भाषा पर तो उनकी इतनी अच्छी पकड़ थी कि उनकी इन भाषा के अपने ही सूत्र थे…
चूंकि मैने अपना बचपन का कुछ हिस्सा अपने गांव में बिताया है इसिलिये आज भी नज़रों के सामने वो दृश्य सामने आ जाता है जब मेरे दादाजी अहले सुबह उठते उन्हें बागवानी का भी काफ़ी शौक था इसिलिये घर के सामने साग- सब्जी फल-फूल का छोटा बगीचा बना रखा था उन्होने…साग-सब्जी के बगीचे में पानी खाद देते फिर नहा-धोकर पूजा करते झक सफ़ेद धोती-कुर्ता पहन विद्यालय (कर्म स्थल) जाते…

मेरे दादाजी न केवल अच्छे कवि, आशु-कवि थे बल्कि काफ़ी अच्छे चित्रकार भी थे उनकी कविताओं की कई किताबें भी प्रकाशित हुई…मगही माधुरी, मगही काव्य-संग्रह, (दीप-ज्योति) जो मेरे पापा अरुण सज्जन जी ने दादाजी को उनकी पहली पुण्यतिथि पर समर्पित किया था…आज भी बहुत सारी उनकी रचनाओं की पांडुलिपि प्रकाशित होने के लिए रखी हुई हैं । उनके बारे में बताने लगूं तो शायद मेरे शब्द भी कम पडे…
बस इतना ही कहूंगी कि वो काफ़ी स्वभिमानी, कर्मठ, शांत, दयालु और अपने कर्म और कविता को लेकर बेहद समर्पित और सम्वेदनशील इंसान थे और मैं खुद को सौभाग्यशाली समझती हूं कि मैं उनकी पौत्री उनकी छत्र-छाया में रही काफ़ी कुछ उनसे सीखा और उनके आखिरी वक्त में भी उनके साथ थी और सच कहूं तो उनके ना होने का अहसास मुझे कभी भी नहीं होता
मेरे पूज्य दादाजी को मेरा सादर प्रणाम और श्रधांजलि ….