बदलाव के बावजूद बेड़ियों ने जकड़ रखा है
-महिला दिवस की पूर्व संध्या पर-
आज ‘विश्व महिला दिवस ‘है। सभी ओर महिलाओं को बधाईयाॅ देने की होड़ लगी है। पर हमारे देश में प्राचीन काल से ही कोई व्यक्ति विशेष के लिये दिवस मनाने की परम्परा नहीं रही है-यथा मातृ दिवस, पितृ दिवस भ्राता दिवस, मित्रता दिवस प्रेम दिवस महिला दिवस और न जाने कितने दिवस।
प्रियंका राय/Patna

एक बार महिला सशक्तिकरण के किसी उदाहरण को परिचित कराने के दौरान एक सज्जन के द्वारा समाज में व्याप्त उन लड़कियों व् महिलाओं के प्रति चिंतन को दर्शाते पाया, जिन्हें शायद समय में बदलाव के बावजूद बेड़ियों ने जकड़ रखा है। मतलब उनके लिये परिवर्तन ने भी एक स्थाई डेरा बनाये रखा है और वास्तव में यह विषय सोचनीय है।
हमारे ग्रुप में नारीशक्ति के सम्मान को सदैव प्रधानता मिली है। इस पर परिचर्चाएं भी अक्सर होती रहती हैं। पर, हर समस्या का समाधान व् उनका उन्मूलन एक बेहतर स्तर पर हो यह भी निःसंदेह आवश्यक है। अतः इसके लिये प्रयासरत भी मुझे और आपको ही होना है। परिवार से समाज और समाज से देश तक की भूमिका हमारी ही होती है। अतः महिलाओं की स्थित को सुधारने के लिये दृढ संकल्पित होंने की आवश्यकता है।
जो समाज जितना अधिक गत्यात्मक एवं परिवर्तनशील होगा उसमें उतनी ही अधिक ऊर्जा विद्यमान होंगी। समाज का ताना-बाना इतना जटिल है कि इसकी एक इकाई मे होने वाला परिवर्तन अन्य इकाईयों को भी प्रभावित करता है। विभिन्न युगों में सामाजिक परिवर्तन की गति अलग-अलग रही है। वर्तमान समय में सामाजिक परिवर्तन अति तीव्र गति से हो रहा है। समाज इन सामाजिक समस्याओं का उन्मूलन करने के लिए सदैव प्रयासरत रहना चाहिये क्योंकि, सामाजिक समस्याएं सामाजिक व्यवस्था में विघटन पैदा करती हैं।
मेरा ये लेखन मन की कोरी उड़ान नही बल्कि हकीकत की गाथा है, जिसका आधार जीवन का वास्तविक अनुभव है। जैसे ही हम किसी कार्य को करने का निर्णय लेते हैं हमारा पहला चरण उस कार्य को करने के लिए इच्छाशक्ति को जागृत करना होता है।अगर किसी कार्य की शुरुआत अच्छे से हो जाए तो आधा कार्य तो उसी वक्त हो जाता है ऐसा माना जाता है। हमारी इच्छाशक्ति एक घोड़े की तरह होती है, इसे ज्यादा-से-ज्यादा दौड़ने दीजिए इसकी शक्ति और बढ़ेगी और इसकी दौड़ और भी ज्यादा तेज हो जाएगी। यह ज्यादा दूरी तय कर पाएगी और अपनी मंजिल तक भी जल्दी पहुंच जाएगी। अतः जिनके लिये प्रयासरत हैं और जो प्रयासरत हैं दोनों की दृढ इच्छाशक्ति का होना परम आवश्यक है। इच्छाशक्ति का इस्तेमाल करें यह सभी लिए बेहद मददगार साबित होगा।
कहने का तात्पर्य यह है कि, जीते तो सभी हैं लेकिन जब आपके कर्मों से आपके जीवन की सार्थकता झलकने लगे तो समझिए आप सही जा रहे। महिला दिवस की अग्रिम शुभकामनाएं आप सभी को कुछ अच्छे उद्धेश्यों के साथ।
नारी तुम हो सबकी आशा…!!!
…तो फिर अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस भी क्यों नहीं मनाया जाता
गुरूर है मुझे कि मैं नारी हूँ

गुरूर है मुझे मैं नारी हूँ
भगवान की संरचना में शामिल ।
एक ख़ूबसूरत फूल हूँ
सभी के आँगन में , शामिल ।😊
😊
रख़ती हूँ सबका खयाल ,
न आए किसी पर आँच
सबको खुशियाँ बाँटना चाहती हूँ☺
☺
जो कमल के समान ,
सबके आँगन में खिलती हूँ । 🙂
🙂
मैं कोई काँटा नहीं ,
जो किसी को चोट लगा दूँ ।
मैं कोई विष नहीं ,
जो नफ़रत फैला दूँ ।😀
😀
मैं तो बस इस संसार का ,
ख़ूबसूरत फूल हूँ ,
जो इस संसार को ,
आनंदित करना चाहती हूँ ।
गुरूर है मुझे कि मैं नारी हूँ ।😃
अगर बेटों को यह बताया जायें कि बेटा-बेटी में कोई भेद नहीं, उसे अपने घर से हीं महिलाओं का सम्मान करना सीखाया जाएं तो इस समस्या पर बहुत हद तक काबू पाया जा सकता है

महिलाएं ईश्वर की सबसे खूबसूरत और सशक्त रचना है। महिलाओं के प्रति प्रेम, प्रशंसा और सम्मान प्रदर्शित करने के लिए हर साल की भांति इस साल भी 8 मार्च को हम सभी “महिला दिवस”मना रहें हैं। मेरी नजर में नारी तो अपने आप में संपूर्ण है। फिर भी महिलाओं के लिए खास दिन की आवश्यकता यह दर्शाता है कि समाज में असमानता मौजूद है, क्योंकि हम सब “पुरुष दिवस” नहीं मनाते हैं। हमारे बीच लिंगभेद न हो और सभी को समानता का अहसास हो, तो “महिला दिवस”मनाने की आवश्यकता हीं नहीं पड़ेगी।
हर मोड पर चुनौती है और हमे डटकर लड़ना है

बहुत खुशी होती है ये कहते हुए की आज महिला दिवस है. मगर क्या साल का एक दिन हमारे 363 दिनो के सच्चाई को छुपा सकता है??? जिस दिन हम स्वाभिमान और सम्मान से जीना शुरू कर देंगे उस दिन से हमारा दिवस शुरु हो जाएगा. हम आज भी शोषण की जिन्दगी जी रहे है. हर मोड पर चुनौती है और हमे डटकर लड़ना है.

माँ के रूप में, पत्नी के रूप में, बहन के रूप में, दादी,नानी,भाभी,मामी,चाची, बुआ,आंटी, हर रूप अलग छवि लिए हुए,।या यूँ कहिये हर एक किरदार को बखूबी निभाते हुए,चाहे गृहिणी रही हो या नौकरीपेशा।
कितनी भी बहुमंजिली इमारत हो,उसे टीके रहने के लिए मजबूत नींव की जरूरत होती है,वैसे ही हम औरतें एक पारिवार को बनाएं रखने के लिए नींव जितनी शक्ति रखती हैं।तभी तो सशक्तिकरण की पहचान कही जाती हैं।
निश्छल,शालीन,मृदुभाषी के साथ -साथ,कदम से कदम मिलकर चलने वाली सभी महिलाओं के साथ HAPPY WOMEN’S DAY!
-अमिता शर्मा
नारी में इतनी शक्ति है कि वो बना सकती है तो मिटा भी सकती है

सर्वप्रथम तो महिला दिवस की सभी सुंदर सुगढ महिलाओं को बधाई, परंतु मेरे विचार से कोई एक दिन महिलाओं के लिये नहीं हो सकता !!
ज्यादा विस्तार में अपनी बात ना रखते हुए मैं यही कहना चाहुंगी कि नारी अपने आप में अनूठी, आज़ाद और शक्तिमयी रचना है, ये ईश्वर के बाद हम इंसान की रचना कार है पालनहार है अलग वजूद है हम नारी !!
नारी में इतनी शक्ति है कि वो बना सकती है तो मिटा भी सकती है मेरी मां कहा करती है “एक औरत कूअन(खराब) दाने को सुअन(साफ़ और सुंदर ) दाने में बदल सकती है मतलब यही कि एक औरत अपने घर समाज को अपने प्यार दुलार से सजा सकती है बसा सकती है वहीं दूसरी ओर बिगाड़ भी सकती है !! इसिलिये हम नारी को सुंदरता शालीनता का पर्याय बन अपने घरको समाज को सुंदर बनाने में अपनी उर्जा को लगाना चाहिये !
घर की,समाज की सभ्यता और संस्कृति को सुचारू और सही रुप में चलाने की जिम्मेदारी हम नारी पर ज्यादा है इसलिये हमारा फर्ज बनता है कि हम अपनी गरिमा बनाए रखें ताकि कोई भी हम पर किसी भी प्रकार से बुरी या टेढी नज़र डालने की सोच भी ना सके!!
ऊंचे ऊंचे पद पर बैठी, सम्मान की वो अधिकारी

सजग, सचेत, सबल, समर्थ
आधुनिक युग की नारी है
मत मानो अब अबला उसको , सक्षम है बलधारी है
बीत गई वो कल की बेला
जीती थी वो घुट घुट कर
कुछ न कहती , सब कुछ सहती
पीती आंसू छुप छुप कर
आज बनी युग की निर्माता, हर बाधा उस से हारी है
चारदीवारी का हर बन्धन
तोड़ के बाहर आई है
घर, समाज और देश में उसने
अपनी जगह बनाई है
ऊंचे ऊंचे पद पर बैठी, सम्मान की वो अधिकारी है
मत समझो निर्बल बेबस,
लाचार आज की नारी है ,
नर की प्रबल प्रेरणा का
आधार आज की नारी है ,
स्नेह, प्रेम व ममता का
भन्डार आज की नारी है ,
हर जंग जीते शान से यह, अभियान अभी भी जारी है
Gunjan S. Tripathi/Allahabad

हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी पूरा विश्व अंतरराष्ट्रीय महिला वर्ष मनाने को आतुर है। लेकिन समस्याए ज्यो की त्यों सब फिर पहले ही जैसा आता जाता रहेगा ।सीमित दायरा से निकल कर अपने आप धरती से गगन तक अपना अधिकार सुरक्छित करने को आतुर। महत्वाकांछीनी पुरुषों के कंधे से कंधामिला कर चलने में समर्थ ।बेटी के रूपमे आज्ञाकी प्रतिमा बहन के रूप मे स्नेह की मूर्ति ,माँ के रूप ममता का आँचल ,पत्नी के रूप में सहानभूति और असीम प्यार की प्रेरणा और प्रेमिका के रूप में प्यार का सागर होती है। इनकी कोई सीमा नहीं होती, ये जब जब दया पे आती है तो अपना तन मन दे डालती हैऔर जब प्रतिशोध का ठान लेती है तो ज्वालामुखी बन कर नाश कर डालती है।
प्राचीन काल में महिलाओं को हर क्षेत्र में आजादी थी

आज ‘विश्व महिला दिवस ‘है। सभी ओर महिलाओं को बधाईयाॅ देने की होड़ लगी है। पर हमारे देश में प्राचीन काल से ही कोई व्यक्ति विशेष के लिये दिवस मनाने की परम्परा नहीं रही है-यथा मातृ दिवस, पितृ दिवस भ्राता दिवस, मित्रता दिवस प्रेम दिवस महिला दिवस और न जाने कितने दिवस। पुरातन काल से ही हमारे देश की सामाजिक एवं सांस्कृतिक संरचना और नैतिक मूल्य ऐसे रहे है कि हर दिन समानता का भाव रखता है।”सर्वजन हिताये और सर्वजन सुखाय” की भावना रही है।हमारे आर्यावर्त में महिला दिवस की आवश्यकता क्यों ? आदिकल से हम देखे तो हर युग और हर काल में महिलाएँ हर क्षेत्र में सक्षम रहीं है चाहे वो ज्ञान हो,साहित्य हो, युद्ध कौशल हो, बुद्धिमत्ता हो, दृढ़ इच्छा शक्ति हो। किसी भी मायने में वो पुरुषों से कम नहीं थी।
ईश्वर ने महिला एवं पुरुष की शारीरिक एवं मानसिक रचना इस प्रकार बनायी कि दोनों एक दूसरे के पूरक हो ना कि प्रतिस्पर्धी। ताकि समाज का विधटन ना हो और समाज सूचारू रूप से चलता रहे। कुदरती तौर पर जो गुण धर्म हमें मिला है हमें उससे गौरवान्वित होना चाहिए। हमें स्वयं को कमतर नहीं समझना है। हर दिन हमारी संस्कृति को समर्पित हो। आज की महिलाएॅ भी कितनी सक्षम है यह बतलाने की आवश्यकता नहीं है। स्वयं में आत्मविश्वास हो तो कोई कमजोर नहीं हो सकता ।अतः आत्मशक्ति को जाग्रत करने की आवश्यकता मात्र है। हरदिन मानवीय मूल्यों का है।