लगा, उपन्यास का हीरो मेरे सामने है: उमा राय
मुझे लगा, किसी उपन्यास का हीरा जीवंत हो मेरे सामने आया है। एक समझदार, मेरी सोच से अधिक सुन्दर, स्नेही, दयालु, क्षमाशील तथा सम्मान देने वाले मधुर स्वभाव के व्यक्ति मुझे मिले।
उमा राय, पत्नी- श्री यू के राय, पूर्व आईएएस अधिकारी
आज के दिन 48 साल पहले दिनांक 1जून 1969 को मेरी जिंदगी में सारे जहाँ की खुशियां एक बार में ही मिल गयी। मेरी शादी यू के राय साहब के साथ हो गई। बालिका वधू की तरह 14 साल की उम्र में मैट्रिक की परीक्षा समाप्त होने के दूसरे दिन मंडप मे बैठा दी गई। परंपरा के मुताबिक शादी हो रही थी इसलिए मन में कोई हलचल नहीं थी।
सच कहूं तो मैं बेहद खुश थी। मेरी खुशी और बढ़ गई जब मैंने मंडप में इन्हें देखा। 19-20 साल के एक नौजवान मेरे सामने थे। गुलशन नंदा का उपन्यास मैं पढ़ने लगी थी। मुझे लगा, किसी उपन्यास का हीरा जीवंत हो मेरे सामने आया है। एक समझदार, मेरी सोच से अधिक सुन्दर, स्नेही, दयालु, क्षमाशील तथा सम्मान देने वाले मधुर स्वभाव के व्यक्ति मुझे मिले।
मैं और तुम अब हम हो गये थे। हंसते गाते, लड़ते झगडते एक दूसरे को साथ देते मैंने उनकी मदद से आइ ए, बी ए और लॉ की पढ़ाई पूरी की। साहेब तो एमए पास करते ही डिप्टी कलेक्टर बन गये थे। मेरी तीन बेटियां और दो बेटों ने पढ़ाई में हमारे निगरानी में अच्छा प्रदर्शन किया और सभी अच्छी नौकरियों में हैं।
मेरे पतिदेव तो 2010 में वरीय आइएएस के रुप में लेबर कमिश्नर तथा सचिव के पद से रिटायर होने के बाद बच्चों के साथ दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु तथा पटना में रहते हैं।
आज मैं इस अवसर पर अपने स्वसुर स्व यदुनंदन महाराज सासू मां श्याम सुंदरी देवी पिता स्व चतुर्भुज राय भट्ट एवं माता स्व कौशल्या देवी के स्नेह, सहयोग एवं आशीर्वाद के लिए अनुग्रहित हूं।